कस्टम्स, एक्साइज एंड सर्विस टैक्स अपीलीय अधिकरण (CESTAT) ने अडानी समूह की छह कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए कस्टम विभाग द्वारा दायर सभी छह अपीलों को खारिज कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने माना कि जिन आरोपों के आधार पर विभाग ने कार्रवाई की थी, वे पहले ही समान जांच और समान साक्ष्यों के आधार पर निर्णीत हो चुके हैं और उन मामलों में विभाग को सुप्रीम कोर्ट तक हार का सामना करना पड़ा था।
यह मामला निदेशालय राजस्व खुफिया (DRI) की उस जांच से जुड़ा था, जिसमें अडानी समूह की विभिन्न कंपनियों द्वारा विदेशी आपूर्तिकर्ता इलेक्ट्रोजन इन्फ्रा एफजेडई (EIF), यूएई से आयातित उपकरणों और मशीनरी के कथित ओवरवैल्यूएशन (अधिक मूल्यांकन) का आरोप लगाया गया था। विभाग का दावा था कि आयातित वस्तुओं का घोषित मूल्य वास्तविक कीमत से अधिक दिखाया गया, जिससे कस्टम मूल्यांकन नियमों का उल्लंघन हुआ।
विवाद में शामिल कंपनियों में अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड, अडानी रिन्यूएबल एनर्जी एलएलपी, अडानी हजीरा पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड, अडानी इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड तथा अडानी विजाग कोल टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड शामिल थीं। इन कंपनियों ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं, बंदरगाह अवसंरचना और कार्गो संचालन के लिए विभिन्न उपकरणों का आयात किया था।
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान विवाद उसी डीआरआई जांच से उत्पन्न हुआ है जिसके आधार पर पहले दो शो कॉज नोटिस जारी किए गए थे। उन मामलों में भी विभाग ने ओवरवैल्यूएशन का आरोप लगाया था, लेकिन संबंधित प्राधिकरणों ने आरोपों को खारिज कर दिया था। बाद में CESTAT ने विभाग की अपीलें खारिज कर दीं और सुप्रीम कोर्ट ने भी विभाग की सिविल अपीलों तथा पुनर्विचार याचिकाओं को अस्वीकार कर दिया था।
न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जब तीनों शो कॉज नोटिस एक ही जांच, एक जैसे दस्तावेजों और समान आरोपों पर आधारित हैं, तब पहले मामलों में दिए गए निष्कर्ष वर्तमान मामले पर भी लागू होंगे। ट्रिब्यूनल ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि मामला तथ्यात्मक निष्कर्षों से तय हो चुका है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू आयातित वस्तुओं के मूल्य निर्धारण से जुड़ा था। विभाग ने कस्टम्स वैल्यूएशन (डिटरमिनेशन ऑफ वैल्यू ऑफ इम्पोर्टेड गुड्स) रूल्स, 2007 तथा कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 14 के तहत घोषित मूल्य को अस्वीकार करने की मांग की थी। हालांकि, प्रधान आयुक्त ने पाया कि आयात अनुबंध अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से दिए गए थे और कीमतें पारदर्शी तरीके से तय की गई थीं। इसलिए केवल संबंधित पक्षों के बीच संबंध होने से यह साबित नहीं होता कि कीमतें प्रभावित हुई थीं।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि विभाग द्वारा विदेशी बैंकों से प्राप्त दस्तावेजों पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई गई, लेकिन इन दस्तावेजों के साथ कस्टम्स एक्ट की धारा 138C(4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। ऐसे में इन दस्तावेजों की साक्ष्यात्मक वैधता संदेहास्पद हो जाती है। इसी आधार पर पूर्व मामलों में भी विभाग के आरोप असफल रहे थे।
अधिकरण ने आगे कहा कि जब आयातित वस्तुओं के मूल्य में किसी प्रकार की गलत घोषणा सिद्ध नहीं हुई, तब कस्टम्स एक्ट की धारा 111(m) के तहत माल की जब्ती का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी कारण धारा 112(a) और धारा 114AA के तहत प्रस्तावित दंड भी लागू नहीं किए जा सकते।
यह फैसला कस्टम मूल्यांकन, ओवरवैल्यूएशन के आरोपों और संबंधित पक्षों के बीच होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक लेनदेन से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय यह स्पष्ट करता है कि यदि आयात मूल्य प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से तय हुआ हो और उसके समर्थन में पर्याप्त व्यावसायिक आधार मौजूद हो, तो केवल संदेह के आधार पर घोषित मूल्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
अंततः CESTAT ने कहा कि प्रधान आयुक्त द्वारा 21 दिसंबर 2023 को पारित आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और इसलिए कस्टम विभाग की सभी छह अपीलें खारिज की जाती हैं।
Commissioner of Customs (Import-I), Mumbai v. Adani Enterprises Ltd. & Others, Final Order Nos. 85706-85711/2026, CESTAT Mumbai
