आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT), दिल्ली ने एक महत्वपूर्ण फैसले में डिमोनेटाइजेशन के दौरान जमा किए गए ₹5.60 करोड़ से अधिक की नकदी को अघोषित आय मानने से इनकार करते हुए आयकर विभाग द्वारा की गई पूरी जोड़तोड़ रद्द कर दी है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि जब नकदी का स्रोत ऑडिटेड खातों और व्यापारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से साबित हो चुका है, तब उसे आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत “अस्पष्टीकृत धन” नहीं माना जा सकता।
मामला दिल्ली के व्यवसायी राकेश कुमार से जुड़ा था, जो एम/एस आर.वी. गोल्ड हॉलमार्क के नाम से आभूषण और बुलियन कारोबार करते हैं। आयकर विभाग ने डिमोनेटाइजेशन अवधि में उनके बैंक खाते में जमा ₹5.60 करोड़ की नकदी को संदेहास्पद मानते हुए धारा 69A के तहत जोड़ दिया था। विभाग का कहना था कि नकदी जमा का स्रोत साबित नहीं किया जा सका और कथित ग्राहकों ने भी जांच में सहयोग नहीं किया।
हालांकि, करदाता ने ट्रिब्यूनल को बताया कि यह राशि ग्राहकों से 8 नवंबर 2016 से पहले प्राप्त अग्रिम भुगतान थी, जिसे नोटबंदी के बाद बैंक में जमा किया गया। इसके बाद उसी धन से एस.एस. बुलियन से बैंकिंग चैनल के माध्यम से सोना खरीदा गया और ग्राहकों को आपूर्ति की गई। खरीद से संबंधित बिल, भुगतान विवरण, ऑडिट रिपोर्ट और खातों की पुस्तिकाएं भी प्रस्तुत की गईं।
ITAT ने पाया कि आयकर विभाग स्वयं करदाता के व्यापारिक आय को स्वीकार कर चुका था, लेकिन उसी व्यापार से प्राप्त नकदी जमा पर संदेह जता रहा था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि यदि व्यवसायिक आय को स्वीकार किया गया है तो उसी व्यवसाय से संबंधित नकदी जमा को अघोषित आय नहीं माना जा सकता। न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि VAT नियमों के कथित उल्लंघन का मुद्दा VAT अधिकारियों का विषय है, न कि आयकर निर्धारण का।
इन टिप्पणियों के साथ ITAT ने ₹5.60 करोड़ की पूरी जोड़तोड़ हटाते हुए करदाता की अपील स्वीकार कर ली। यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां डिमोनेटाइजेशन के दौरान जमा नकदी का स्रोत व्यापारिक रिकॉर्ड और ऑडिटेड खातों से साबित किया गया हो।
