भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि मध्यस्थता (Mediation) भविष्य की न्याय व्यवस्था का सबसे प्रभावी माध्यम बनने जा रही है और भारत के पास वैकल्पिक विवाद निपटान (Alternative Dispute Resolution-ADR) के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व स्थापित करने के लिए आवश्यक विधिक, संस्थागत और तकनीकी आधार उपलब्ध है।
नई दिल्ली में माध्यम इंटरनेशनल काउंसिल फॉर कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन द्वारा आयोजित इंटरनेशनल एडीआर कॉन्फ्रेंस-2026 के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई ने न्यायपालिका, अधिवक्ताओं, नीति निर्माताओं और मध्यस्थता विशेषज्ञों से भारत के एडीआर तंत्र को और अधिक सशक्त बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयासों से भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद समाधान का प्रमुख केंद्र बनाया जा सकता है।
मध्यस्थता अब मुकदमेबाजी का विकल्प नहीं, न्याय प्रणाली का अभिन्न हिस्सा
“एडीआर पाथवेज टू लीगल हार्मनी” विषय पर अपने संबोधन में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि पहले मध्यस्थता को केवल मुकदमेबाजी के विकल्प के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब यह न्याय वितरण प्रणाली का अभिन्न स्तंभ बनती जा रही है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि न्याय की अवधारणा और उसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है।
एक अनुभव से समझाया मध्यस्थता का महत्व
सीजेआई ने अपने वकालत के शुरुआती दिनों का एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि दो व्यावसायिक साझेदार एक व्यावसायिक विवाद लेकर अदालत पहुंचे थे। बाद में दोनों ने अदालत के बाहर बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान किया और आपसी सहमति से समझौता तैयार किया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि मध्यस्थता केवल विवाद समाप्त नहीं करती, बल्कि आपसी संबंधों को भी सुरक्षित रखती है, जो किसी न्यायिक आदेश से हमेशा संभव नहीं होता।
स्वैच्छिक अनुपालन की संभावना अधिक
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता की सबसे बड़ी शक्ति पक्षकारों की स्वायत्तता (Party Autonomy) है। इसमें समाधान न्यायालय द्वारा थोपा नहीं जाता, बल्कि संबंधित पक्ष स्वयं स्वीकार करते हैं। उन्होंने विभिन्न अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यस्थता से हुए समझौतों का स्वैच्छिक पालन न्यायालयों के निर्णयों की तुलना में अधिक होता है, जिससे यह विवाद समाधान का अधिक प्रभावी और स्थायी माध्यम बन जाता है।
मुकदमेबाजी और मध्यस्थता में अंतर
उन्होंने कहा कि न्यायालय और मध्यस्थ न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) मुख्य रूप से पक्षकारों के कानूनी अधिकारों और दायित्वों का निर्धारण करते हैं, जबकि मध्यस्थता व्यावहारिक, पारस्परिक रूप से स्वीकार्य और दीर्घकालिक समाधान खोजने का अवसर प्रदान करती है। इससे व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंध भी सुरक्षित रहते हैं।
मध्यस्थता अधिनियम, 2023 को बताया ऐतिहासिक कानून
सीजेआई ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 (Mediation Act, 2023) को भारत में एडीआर प्रणाली को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कानून बताया। उन्होंने कहा कि पहली बार इस कानून ने मध्यस्थता के लिए व्यापक कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया है। इसके तहत पक्षकार अपनी पसंद का मध्यस्थ और प्रक्रिया चुन सकते हैं तथा मध्यस्थता से हुए समझौते को दीवानी न्यायालय की डिक्री के समान कानूनी मान्यता प्राप्त होती है।
न्यायपालिका लगातार कर रही है एडीआर को मजबूत
उन्होंने कहा कि देशभर में कोर्ट-अनुबंधित मध्यस्थता केंद्रों (Court-Annexed Mediation Centres) की स्थापना, न्यायिक अकादमियों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम, तथा मध्यस्थता संबंधी न्यायिक निर्णयों का विकास यह दर्शाता है कि न्यायपालिका एडीआर प्रणाली को संस्थागत रूप से मजबूत करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
ऑनलाइन विवाद समाधान की बढ़ती भूमिका
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ऑनलाइन विवाद समाधान (Online Dispute Resolution-ODR) और मेड-आर्ब-मेड (Med-Arb-Med) जैसी आधुनिक प्रणालियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय और सीमा-पार वाणिज्यिक विवादों के समाधान को अधिक सुलभ, तेज और प्रभावी बनाया है।
भारत बन सकता है वैश्विक एडीआर केंद्र
अपने संबोधन के समापन में सीजेआई ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि न्यायपालिका, सरकार, विधि विशेषज्ञ और मध्यस्थता संस्थान मिलकर कार्य करें तथा विधायी सुधारों को निरंतर आगे बढ़ाया जाए, तो भारत निकट भविष्य में वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है।
