छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (रेरा) ने रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के खिलाफ दायर एक महत्वपूर्ण शिकायत को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि भूमि विनिमय (लैंड एक्सचेंज) से जुड़े विवाद रेरा के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। प्राधिकरण ने कहा कि यह मामला रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 के तहत नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के अंतर्गत किए गए भूमि विनिमय समझौते से संबंधित है, इसलिए इसकी सुनवाई रेरा नहीं कर सकता।
मामला रायपुर के इंद्रप्रस्थ फेस-2 परियोजना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता राजकुमार अग्रवाल और शिवशंकर अग्रवाल ने रेरा में आवेदन प्रस्तुत कर आरोप लगाया था कि उनकी भूमि अधिग्रहित किए जाने के बदले रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा उन्हें वर्ष 2014 में एक भूखंड आवंटित किया गया था, लेकिन 12 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो भूखंड का विकास किया गया और न ही उसका कब्जा सौंपा गया।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार 26 जून 2014 को आवंटन संबंधी पंजीकृत अनुबंध निष्पादित किया गया था। समझौते के तहत परियोजना पूर्ण होने के तीन माह के भीतर विकसित भूखंड का कब्जा दिया जाना था, लेकिन वर्षों बाद भी भूखंड की सीमांकन और विकास प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। उन्होंने दावा किया कि कई बार अधिकारियों से संपर्क करने और कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
आवेदकों ने रेरा से मांग की थी कि आरडीए को पंजीकृत हस्तांतरण विलेख निष्पादित करने, भूखंड का शांतिपूर्ण कब्जा देने तथा 12 वर्षों की देरी के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा और 50 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में दिलाने का निर्देश दिया जाए।
वहीं, रायपुर विकास प्राधिकरण ने शिकायत का विरोध करते हुए कहा कि कई आरोप तथ्यहीन हैं। प्राधिकरण ने बताया कि संबंधित भूमि पहले शासकीय भूमि थी और उसे प्राधिकरण के नाम हस्तांतरित करने की प्रक्रिया लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण विलंबित हुई। आरडीए का कहना था कि वर्ष 2024 में भूमि का हस्तांतरण उसके नाम हुआ, जिसके बाद आगे की कार्रवाई संभव हुई। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि उसने शिकायतकर्ताओं को आवश्यक दस्तावेजों के साथ संपर्क करने के लिए पत्र भेजे थे, लेकिन उनकी ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
मामले की सुनवाई के दौरान रेरा ने सबसे पहले यह जांच की कि क्या उसे इस विवाद पर निर्णय देने का अधिकार है। प्राधिकरण ने पाया कि संबंधित अनुबंध छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 56 के तहत भूमि विनिमय व्यवस्था के रूप में किया गया था। रेरा ने कहा कि उसका अधिकार क्षेत्र मुख्य रूप से प्रमोटर और आवंटी के बीच रेरा अधिनियम के तहत निष्पादित बिक्री या विकास संबंधी समझौतों तक सीमित है।
प्राधिकरण ने अपने आदेश में माना कि यह विवाद किसी सामान्य रियल एस्टेट बिक्री अनुबंध से उत्पन्न नहीं हुआ है, बल्कि एक वैधानिक शहरी विकास योजना के तहत भूमि के बदले भूमि आवंटन से संबंधित है। ऐसे मामलों पर निर्णय देने का अधिकार रेरा को प्राप्त नहीं है। इसी आधार पर शिकायत को खारिज कर दिया गया।
यह आदेश उन भू-स्वामियों और आवंटियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो विकास प्राधिकरणों द्वारा संचालित योजनाओं में भूमि अधिग्रहण या भूमि विनिमय के बदले भूखंड प्राप्त करते हैं। रेरा ने स्पष्ट संकेत दिया है कि हर संपत्ति विवाद उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और विवाद की प्रकृति के आधार पर संबंधित पक्षों को उचित न्यायिक या वैधानिक मंच का चयन करना होगा।
इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हुआ है कि यदि किसी विवाद की जड़ किसी विशेष राज्य कानून या भूमि विनिमय व्यवस्था में है, तो केवल परियोजना के रेरा में पंजीकृत होने से ही रेरा को उस विवाद पर सुनवाई का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
अदालत/प्राधिकरण: छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (रेरा), रायपुर
मामला: राजकुमार अग्रवाल एवं अन्य बनाम रायपुर विकास प्राधिकरण
