सीसीआई की बड़ी कार्रवाई: दवा कंपनियों और केमिस्ट संगठनों की कथित प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवस्था पर कड़ा रुख, स्टॉकिस्ट नियुक्ति और नई दवाओं की लॉन्चिंग पर नियंत्रण के आरोप

Competition Commission of India CCI

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने देश के दवा वितरण क्षेत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण और लंबे समय से लंबित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दवा कंपनियों, केमिस्ट संगठनों और फार्मा उद्योग संघों की कार्यप्रणाली की विस्तृत जांच की है। यह मामला वर्ष 2012 में दायर शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ व्यापारिक संगठन और दवा कंपनियां ऐसी व्यवस्थाओं का पालन कर रही थीं, जिनसे बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती थी और नई दवा कंपनियों तथा वितरकों के लिए स्वतंत्र रूप से कारोबार करना कठिन हो जाता था।

मामले की शुरुआत ऑल इंडिया केमिस्ट्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (AICDF) के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता द्वारा प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 19(1)(a) के तहत शिकायत दायर करने से हुई थी। शिकायत में ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD), विभिन्न राज्य स्तरीय केमिस्ट संगठन, दवा निर्माता संघों और कई प्रमुख फार्मास्यूटिकल कंपनियों सहित कुल 34 पक्षों को नामजद किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इन संस्थाओं ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3 और धारा 4 का उल्लंघन करते हुए बाजार में प्रतिस्पर्धा को सीमित करने वाली व्यवस्थाएं लागू कीं।

शिकायत के अनुसार, कई दवा कंपनियों को नए स्टॉकिस्ट नियुक्त करने से पहले संबंधित केमिस्ट संगठनों से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) या लेटर ऑफ कोऑपरेशन (LOC) प्राप्त करना अनिवार्य बनाया जाता था। इसके अलावा नई दवाओं को बाजार में उतारने से पहले प्रोडक्ट इंफॉर्मेशन सर्विस (PIS) की स्वीकृति लेने और इसके लिए शुल्क देने का भी दबाव बनाया जाता था। आरोप था कि यदि कंपनियां इन शर्तों का पालन नहीं करती थीं तो उनके उत्पादों की आपूर्ति बाधित की जा सकती थी या उनका बहिष्कार किया जा सकता था।

प्रथम दृष्टया मामला बनता देखकर सीसीआई ने फरवरी 2012 में अपने महानिदेशक (DG) को जांच का आदेश दिया। हालांकि, कर्नाटक केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन द्वारा कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर किए जाने के कारण जांच कई वर्षों तक रुकी रही। वर्ष 2022 में हाईकोर्ट द्वारा रोक हटाने के बाद जांच दोबारा शुरू हुई और अप्रैल 2024 में डीजी ने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट आयोग को सौंपी।

डीजी की जांच में पाया गया कि कई केमिस्ट संगठनों ने स्टॉकिस्ट नियुक्ति के लिए NOC और LOC को अनिवार्य शर्त बना दिया था, जिससे दवाओं की आपूर्ति और वितरण पर नियंत्रण स्थापित किया जा रहा था। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ संगठनों ने नई दवाओं के बाजार में आने से पहले PIS स्वीकृति को भी आवश्यक बना रखा था। आयोग के अनुसार, इस प्रकार की व्यवस्था स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है और बाजार में प्रवेश की प्रक्रिया को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करती है।

जांच में यह भी पाया गया कि दवा निर्माता संगठनों और केमिस्ट संगठनों के बीच हुए समझौतों (MoU) के तहत कंपनियों को स्टॉकिस्ट नियुक्त करने से पहले राज्य और जिला स्तर के संगठनों की अनुमति लेने, गैर-अनुसूचित दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन निर्धारित करने तथा प्रत्यक्ष आपूर्ति पर प्रतिबंध जैसी शर्तों का पालन करना पड़ता था। डीजी ने इन व्यवस्थाओं को प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3 के तहत प्रतिस्पर्धा-विरोधी माना।

जांच में कई दवा कंपनियों के विरुद्ध भी ऐसे साक्ष्य मिले कि उन्होंने स्टॉकिस्ट नियुक्ति से पहले NOC की मांग की, PIS स्वीकृति लेकर नई दवाएं लॉन्च कीं, व्यापारिक मार्जिन के निर्धारण में संगठनों के साथ समन्वय किया और कुछ मामलों में संगठनों के निर्देश पर आपूर्ति भी रोक दी। हालांकि, कुछ अन्य आरोपों, जैसे कार्टेल बनाने और ग्राहक संबंधी जानकारी जबरन प्राप्त करने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।

सुनवाई के दौरान आरोपित संगठनों और कंपनियों ने सभी आरोपों से इनकार किया। AIOCD ने आयोग के समक्ष कहा कि NOC और PIS संबंधी व्यवस्थाएं केवल सलाहात्मक थीं, अनिवार्य नहीं। संगठन ने यह भी दावा किया कि वर्ष 2011 में संबंधित समझौते समाप्त कर दिए गए थे और 2013-14 में आयोग के पूर्व आदेशों के बाद उसने अपने सभी सदस्यों को स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए थे कि NOC लेना अनिवार्य नहीं है, PIS शुल्क स्वैच्छिक है और किसी भी दवा कंपनी का बहिष्कार नहीं किया जाएगा।

दवा निर्माता संघों और कई कंपनियों ने भी यह दलील दी कि आयोग पहले भी समान मुद्दों पर निर्णय दे चुका है और वर्ष 2011 के बाद किसी निरंतर प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधि का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। कुछ कंपनियों ने स्वयं को इन व्यापारिक संगठनों के दबाव का शिकार बताते हुए कहा कि उन्होंने किसी अवैध समझौते में स्वेच्छा से भाग नहीं लिया।

यह मामला भारत के दवा वितरण तंत्र में प्रतिस्पर्धा कानून के महत्व को रेखांकित करता है। यदि किसी व्यापारिक संगठन द्वारा स्टॉकिस्ट नियुक्ति, नई दवाओं की लॉन्चिंग या व्यापारिक शर्तों पर सामूहिक नियंत्रण स्थापित किया जाता है, तो वह प्रतिस्पर्धा अधिनियम के दायरे में जांच और कार्रवाई का विषय बन सकता है। आयोग का यह निर्णय दवा कंपनियों, वितरकों, थोक विक्रेताओं और केमिस्ट संगठनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे स्पष्ट संदेश जाता है कि बाजार संबंधी व्यावसायिक निर्णय स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के आधार पर होने चाहिए, न कि सामूहिक दबाव या प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं के आधार पर।