बॉम्बे हाईकोर्ट ने लीलावती ट्रस्ट को अंतरिम राहत देने से किया इनकार, HDFC बैंक के पक्ष में ₹5 लाख लागत का आदेश

The Rajpatra Law

बॉम्बे हाईकोर्ट ने लीलावती कीर्तिलाल मेहता ट्रस्ट और उसके ट्रस्टी प्रशांत मेहता द्वारा दायर 1,000 करोड़ रुपये के मानहानि मुकदमे में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। ट्रस्ट ने HDFC बैंक, उसके प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी Sashidhar Jagdishan तथा अन्य अधिकारियों के खिलाफ यह मुकदमा दायर किया था। अदालत ने ट्रस्ट को छह सप्ताह के भीतर बैंक को 5 लाख रुपये की लागत राशि अदा करने का भी निर्देश दिया है।

Justice Somasekhar Sundaresan की एकलपीठ ने ट्रस्ट की उस अंतरिम अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें बैंक और उसके अधिकारियों को ट्रस्ट एवं उसके ट्रस्टियों के खिलाफ कथित रूप से मानहानिकारक बयान देने से रोकने की मांग की गई थी। ट्रस्ट ने बैंक की वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से पूर्व में जारी प्रेस विज्ञप्तियों और सार्वजनिक बयानों को हटाने तथा सार्वजनिक माफी जारी करने का भी अनुरोध किया था।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अंतरिम राहत पाने के लिए प्रथम दृष्टया मजबूत मामला स्थापित करने में विफल रहे हैं। न्यायालय ने पाया कि इस स्तर पर ऐसा कोई पर्याप्त रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि बैंक द्वारा दिए गए बयान मानहानिकारक थे। साथ ही अदालत ने माना कि सुविधा का संतुलन बैंक के पक्ष में है और किसी सूचीबद्ध वित्तीय संस्था पर इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने से उसे गंभीर नुकसान हो सकता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि HDFC बैंक को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का सार्वजनिक रूप से जवाब देने से रोका जाता है, तो इससे पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे सिद्धांत प्रभावित हो सकते हैं। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि एक विनियमित बैंकिंग संस्था की अपने जमाकर्ताओं, शेयरधारकों और बाजार के प्रति जिम्मेदारियां होती हैं।

मामले में लीलावती ट्रस्ट और प्रशांत मेहता का आरोप था कि बैंक ने विभिन्न प्रेस विज्ञप्तियों और मीडिया बयानों के माध्यम से उन्हें जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वाले (विलफुल डिफॉल्टर) और निरर्थक मुकदमेबाजी करने वाले पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि बैंक की सार्वजनिक टिप्पणियों से यह गलत धारणा बनाई गई कि बड़ी वित्तीय देनदारियां अब भी बकाया हैं और वसूली प्रक्रिया को बाधित करने के लिए लगातार कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

प्रशांत मेहता ने तर्क दिया कि वे कभी भी HDFC बैंक के प्रत्यक्ष उधारकर्ता नहीं रहे और यदि उन पर कोई देनदारी बनती भी है तो वह केवल अपने दिवंगत पिता किशोर मेहता के कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में विरासत में प्राप्त संपत्ति तक सीमित है। इसलिए बैंक के बयान भ्रामक और तथ्यहीन हैं।

हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए 2004 में पारित डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) के आदेश, उसके बाद जारी रिकवरी सर्टिफिकेट, कुर्की की कार्रवाई, गिरफ्तारी संबंधी निर्देशों और विभिन्न न्यायिक मंचों पर दायर चुनौतियों के इतिहास का विस्तृत परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि बकाया राशि, लगभग दो दशक से चल रही वसूली प्रक्रिया और इस विवाद से जुड़ी बार-बार की गई कानूनी कार्यवाहियों संबंधी बैंक के प्रमुख दावे न्यायिक अभिलेखों और दस्तावेजों से समर्थित हैं।

अदालत ने बैंक की इस दलील को स्वीकार किया कि संबंधित बयान बैंक और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ चलाए जा रहे कथित सार्वजनिक अभियान के जवाब में दिए गए थे। न्यायालय ने कहा कि जब किसी संस्था के खिलाफ आरोप सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया और कानूनी कार्यवाहियों के माध्यम से लगाए जा रहे हों, तब उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि लीलावती ट्रस्ट, भले ही मूल उधारकर्ता इकाई न हो, लेकिन उसने सार्वजनिक बयानों, कानूनी कार्यवाहियों और बैंक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों के माध्यम से विवाद में सक्रिय भूमिका निभाई है। अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में बैंक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपनी प्रतिष्ठा और कार्यप्रणाली पर असर डालने वाले आरोपों पर चुप रहे।

अंततः अदालत ने अंतरिम आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि यह आदेश मुख्य मानहानि वाद के गुण-दोषों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं है। यदि मुकदमे की पूर्ण सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद यह सिद्ध होता है कि बैंक के बयान वास्तव में मानहानिकारक थे, तो अदालत उपयुक्त अंतिम राहत, जिसमें स्थायी निषेधाज्ञा भी शामिल है, प्रदान कर सकती है।