कोविड काल में रेमडेसिविर आपूर्ति विवाद: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सिप्ला की तीन साल की ब्लैकलिस्टिंग रद्द की, सुरक्षा जमा राशि लौटाने का आदेश

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दवा निर्माता कंपनी सिप्ला लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान रेमडेसिविर इंजेक्शन की आपूर्ति में कथित कमी के आधार पर लगाया गया तीन वर्ष का ब्लैकलिस्टिंग आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि महामारी के दौरान उत्पन्न असाधारण परिस्थितियों, कच्चे माल की भारी कमी, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और केंद्र सरकार की आवंटन व्यवस्था को नजरअंदाज कर कंपनी के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करना कानूनसम्मत नहीं था। साथ ही कोर्ट ने कंपनी की जब्त की गई सुरक्षा जमा राशि तत्काल वापस करने का निर्देश भी दिया।

मामले के अनुसार छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने मार्च 2021 में रेमडेसिविर इंजेक्शन की खरीद के लिए निविदा जारी की थी, जिसमें 5,000 वायल की मात्रा को केवल अनुमानित बताया गया था। सिप्ला निविदा में सफल बोलीदाता बनी और 31 मार्च 2021 को अनुबंध निष्पादित किया गया। कंपनी ने 3 अप्रैल 2021 के पहले खरीद आदेश के तहत 5,000 वायल की पूरी आपूर्ति कर दी। इसके बाद 8 अप्रैल को 6,000 वायल तथा 9 अप्रैल को एक ही दिन में 35,000 और 15,000 वायल के दो अलग-अलग खरीद आदेश जारी कर दिए गए। इस प्रकार कुछ ही दिनों में कुल मांग 61,000 वायल तक पहुंच गई।

सिप्ला का कहना था कि कोविड-19 की दूसरी लहर के चरम समय में देशभर में रेमडेसिविर की अभूतपूर्व मांग थी। दवा निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे माल की कमी, परिवहन संबंधी बाधाएं, लॉकडाउन, उत्पादन क्षमता पर दबाव और केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों को निर्धारित आवंटन के कारण इतनी बड़ी मात्रा में तत्काल आपूर्ति संभव नहीं थी। कंपनी ने इन परिस्थितियों की जानकारी पत्रों के माध्यम से निगम को दी थी और किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से बचने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद सितंबर 2021 में कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी कर उसके रेमडेसिविर उत्पाद को तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया तथा सुरक्षा जमा राशि भी जब्त कर ली गई।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि यद्यपि निविदा में मात्रा बढ़ाने का प्रावधान था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि क्रय एजेंसी असीमित मात्रा में मांग बढ़ा दे और फिर आपूर्ति न होने पर कठोर दंड लगा दे। अदालत ने कहा कि 5,000 वायल की अनुमानित मात्रा से बढ़ाकर 60,000 से अधिक वायल की मांग करना एक असाधारण स्थिति थी, जिसका निष्पक्ष और व्यावहारिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए था। न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकारी संस्थाएं अनुबंधीय मामलों में भी संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्षता और गैर-मनमानेपन के सिद्धांतों का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ब्लैकलिस्टिंग किसी कंपनी के भविष्य के व्यावसायिक अवसरों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और ऐसा आदेश तभी टिक सकता है जब वह निष्पक्षता, आनुपातिकता और उचित विचार की कसौटी पर खरा उतरे। अदालत ने पाया कि सिप्ला के खिलाफ न तो धोखाधड़ी, न गलत प्रस्तुतीकरण, न घटिया गुणवत्ता की दवा आपूर्ति और न ही किसी नैतिक दुराचार का आरोप था। ऐसे में केवल अनुबंधीय चूक के आधार पर तीन वर्ष की ब्लैकलिस्टिंग और सुरक्षा जमा राशि की जब्ती अत्यधिक और अनुपातहीन दंड थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2021 के ब्लैकलिस्टिंग आदेश और 27 नवंबर 2021 को पारित पुनर्विचार अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया तथा छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड को सिप्ला की सुरक्षा जमा राशि तत्काल लौटाने का निर्देश दिया। अदालत का यह फैसला सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में निष्पक्षता, युक्तिसंगतता और आनुपातिकता के सिद्धांतों को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।