बिलासपुर, 28 जुलाई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को वैधानिक सेवा नियमों के विपरीत पदोन्नति दी गई है, तो उससे कर्मचारी के पक्ष में कोई स्थायी या विधिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता। अदालत ने कहा कि विभाग ऐसी अवैध पदोन्नति को किसी भी समय सुधार सकता है, बशर्ते संबंधित कर्मचारी को सुनवाई का उचित अवसर दिया गया हो।
यह फैसला न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने हिरमन दास महंत एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने जल संसाधन विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी जीप चालक से मैकेनिक ग्रेड-2 पद पर वर्ष 2023 में हुई पदोन्नति को 25 जून 2026 के आदेश से निरस्त कर उन्हें मूल पद पर वापस भेज दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें विधिवत चयन प्रक्रिया के बाद पदोन्नति मिली थी और वे लगभग तीन वर्षों तक पदोन्नत पद पर कार्य करते रहे। उनके नाम मैकेनिक ग्रेड-2 की वरिष्ठता सूची में भी शामिल थे। उन्होंने तर्क दिया कि यदि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) से कोई त्रुटि हुई है तो उसका खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि बिना किसी धोखाधड़ी या गलत जानकारी दिए उनकी पदोन्नति वापस लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि विभागीय जांच में पाया गया कि पदोन्नति वैधानिक नियमों और आवश्यक पात्रता शर्तों का पालन किए बिना दी गई थी। इसलिए पहले दोनों कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, उनके जवाबों पर विचार किया गया और उसके बाद सक्षम प्राधिकारी ने विस्तृत कारणों के साथ पदोन्नति निरस्त करने का आदेश पारित किया। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Union of India v. Narendra Singh (2008) 2 SCC 750 और Fundamental Rule 31-A का हवाला देते हुए कहा कि नियमों के विरुद्ध दी गई पदोन्नति से कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई या दंड का नहीं, बल्कि विभाग द्वारा अपनी प्रशासनिक त्रुटि सुधारने का है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कारण बताओ नोटिस जारी करने से कार्यवाही अनुशासनात्मक नहीं बन जाती। यदि पदोन्नति की नींव ही नियमों के विपरीत हो, तो कर्मचारी उसके आधार पर पद पर बने रहने का दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “वैधानिक नियमों के विरुद्ध दी गई पदोन्नति को किसी भी समय सुधारा जा सकता है और ऐसी अवैध पदोन्नति से कर्मचारी के पक्ष में कोई स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।” न्यायालय ने यह भी दोहराया कि “कानून के विरुद्ध किसी प्रकार का एस्टॉपल लागू नहीं हो सकता।”
न्यायालय ने पाया कि विभाग ने कर्मचारियों को सुनवाई का पूरा अवसर दिया था और सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश में किसी प्रकार की मनमानी, दुर्भावना या अधिकार क्षेत्र से संबंधित त्रुटि नहीं थी। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता। परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
यह निर्णय सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि यदि किसी कर्मचारी को नियमों के विपरीत पदोन्नति मिलती है, तो केवल लंबे समय तक उस पद पर कार्य करने से उसे उस पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। विभाग वैधानिक नियमों के अनुरूप ऐसी त्रुटियों को बाद में भी सुधार सकता है।
