सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को बड़ी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं और केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को उन टिप्पणियों को उनके भविष्य के प्रशासनिक दायित्वों और नियुक्तियों के मूल्यांकन में ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने संजय प्रसाद द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के उक्त निर्देशों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।
गौरतलब है कि 3 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने एक मामले की सुनवाई के दौरान संजय प्रसाद की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में न्यायालय द्वारा निर्देशित पुलिस सुधारों को लागू करने में प्रशासनिक स्तर पर बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं। अदालत ने यह भी कहा था कि संजय प्रसाद का आचरण न्यायालय के अधिकार और उसके निर्देशों को कमजोर करने का प्रयास प्रतीत होता है।
यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका से जुड़ा था, जिसमें एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी की बरामदगी और अभिरक्षा की मांग की थी। महिला का आरोप था कि उसकी बेटी को एक व्यक्ति बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। पुलिस द्वारा बच्ची का पता लगाने और उसे बरामद करने में विफल रहने पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच में गंभीर खामियां पाईं और माना कि जांच अधिकारी निष्पक्ष, प्रभावी और संतोषजनक जांच करने में असफल रहे हैं। इसके बाद अदालत ने सुभाष चंद्र एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में पुलिस जांच प्रणाली में सुधार के लिए जारी निर्देशों के अनुपालन की स्थिति की समीक्षा की।
जब अदालत ने इन निर्देशों के कथित अनुपालन न होने पर संजय प्रसाद से स्पष्टीकरण मांगा, तब राज्य सरकार ने हलफनामे के माध्यम से बताया कि उसने सुभाष चंद्र फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है और हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह उक्त निर्णय के क्रियान्वयन को लेकर कोई अतिरिक्त निर्देश जारी न करे।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मई 2025 में दिए गए सुभाष चंद्र निर्णय को लगभग एक वर्ष तक चुनौती नहीं दी गई और सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय तब लिया गया, जब अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से अनुपालन को लेकर जवाब मांगा गया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि राज्य सरकार को पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट से संबंधित कोई आदेश या निर्णय उसके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य सरकार को किसी भी न्यायिक आदेश को चुनौती देने का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है, लेकिन ऐसा निर्णय किसी अधिकारी के व्यक्तिगत हितों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा था कि पुलिस सुधारों का उद्देश्य कार्यपालिका के अधिकारों को सीमित करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष, पेशेवर और कानूनसम्मत जांच सुनिश्चित करना है।
इन टिप्पणियों के आधार पर हाईकोर्ट ने DoPT को निर्देश दिया था कि वह संजय प्रसाद के संबंध में की गई न्यायालय की टिप्पणियों को रिकॉर्ड पर रखे और भविष्य में उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारियों एवं नियुक्तियों का मूल्यांकन करते समय उन पर विचार करे।
अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इन प्रतिकूल टिप्पणियों और संबंधित निर्देशों के प्रभाव पर अंतरिम रोक लगा दी है। मामले की आगे सुनवाई बाद में की जाएगी।
