बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी धार्मिक संस्था द्वारा जारी फतवे की कानून की नजर में कोई बाध्यकारी वैधानिक स्थिति नहीं है और इसे किसी व्यक्ति के कानूनी या मौलिक अधिकारों के विरुद्ध लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने 3 नवंबर 2026 को यह टिप्पणी करते हुए दो भाई-बहन की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनकी भांजी द्वारा एक शिया मुस्लिम युवक से विवाह करने के छह दिन बाद, 23 अगस्त 2019 को स्थानीय जामा मस्जिद समिति ने फतवा जारी कर उन्हें और उनके परिवार को मुस्लिम समुदाय से बाहर घोषित कर सामाजिक बहिष्कार का निर्देश दिया था।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि मस्जिद समिति ने व्यक्तिगत द्वेष के कारण ऐसा किया, क्योंकि उन्होंने वक्फ बोर्ड में समिति के सदस्यों के विरुद्ध वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत की थी। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पुलिस जांच रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के सामाजिक बहिष्कार का कोई प्रमाण नहीं मिला और ऐसा कोई फतवा जारी होने की पुष्टि भी नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर अनुच्छेद 226 के तहत राहत नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि कथित फतवे से वास्तव में उनका सामाजिक बहिष्कार हुआ अथवा उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को कानून के अनुसार अन्य उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
