छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरौंदा केंद्रों में पांच कैदियों की मौत पर हैरानी जताई, चिकित्सा लापरवाही और प्रक्रियाओं की अनदेखी पर चिंता

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने घरौंदा केंद्रों में पांच कैदियों—चार वयस्क महिलाओं और एक पांच वर्षीय बच्चे—की मौतों पर हैरानी जताई है, साथ ही कथित चिकित्सा लापरवाही, अपर्याप्त निगरानी और दस्तावेजी प्रक्रियाओं की अनुपस्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिन्हें ये मौतें उजागर करती हैं।

घरौंदा केंद्र राज्य के समाज कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय की प्रमुख योजना के तहत दिव्यांग वयस्कों के लिए बनाए गए ग्रुप होम हैं।

कैदियों की मौतों के मद्देनजर रायपुर और बिलासपुर के घरौंदा केंद्रों का निरीक्षण करने वाले कोर्ट कमिश्नर के निष्कर्षों पर गंभीर संज्ञान लेते हुए, मुख्य न्यायाधीश कृष्णा राम मोहापात्रा और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ ने 3 नवंबर को कहा कि रिपोर्टों और तस्वीरों में “दयनीय स्थिति” परिलक्षित होती है। पीठ ने विशेष रूप से यह देखकर सदमा व्यक्त किया कि कैदियों से संवाद करने और उनकी कठिनाइयों को समझने के लिए कोई उपलब्ध नहीं था।

कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट से पता चला कि 2026 में महिला घरौंदा केंद्र में हुई पांच मौतों में शोभा (30) शामिल हैं, जिनकी मृत्यु 24 मई को निमोनिया और सेप्टिक शॉक से हुई; कुमारी बाई (35), जिनकी मृत्यु 9 मई को गंभीर आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया, दौरे के विकार, सोडियम के निम्न स्तर और एस्पिरेशन न्यूमोनाइटिस से हुई; मीना (30), जिनकी मृत्यु 6 जून को तीव्र एंटराइटिस, गंभीर निर्जलीकरण, पेट के तपेदिक और श्वसन विफलता के बाद हुई; कुसुम (45), जिनकी मृत्यु 21 सितंबर को हुई, अस्पताल के रिकॉर्ड में एक्स्ट्रापल्मोनरी तपेदिक का संकेत मिला; और एक पांच वर्षीय बच्चा कबीर, जिसकी मृत्यु 10 अगस्त को सेप्सिस और रिफ्रैक्टरी शॉक से हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल में इलाज और मौतों के रिकॉर्ड उपलब्ध थे, लेकिन घरौंदा प्राधिकरणों ने अलग दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जो यह दर्शाते कि दिशानिर्देशों के खंड 18 के तहत आवश्यक रूप से मौतों की सूचना तत्काल पुलिस, जिला स्तरीय समिति और वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों को दी गई थी। कोर्ट कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का अभाव अपने आप में दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं है, लेकिन मुख्य मुद्दा यह था कि निर्धारित सूचना और प्रक्रियाओं का पालन और दस्तावेजीकरण किया गया था या नहीं।

बच्चे कबीर की मौत—जो रिपोर्ट के अनुसार महिला घरौंदा से जुड़ी सपना नायक का पुत्र था—ने चिंता बढ़ाई और कुछ विसंगतियां भी उजागर कीं। रिपोर्ट के अनुसार, जब कमिश्नर ने केंद्र के कर्मचारियों और प्रबंधक से कबीर की मौत के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि वह स्वस्थ था, बिस्तर से गिर गया, उसे दौरे पड़े और बाद में अस्पताल ले जाया गया। हालांकि, अस्पताल के रिकॉर्ड में कई गंभीर चिकित्सीय स्थितियां सामने आईं, जिनमें न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस, पोषण संबंधी एनीमिया और तपेदिक शामिल थे, साथ ही सेप्सिस और रिफ्रैक्टरी शॉक मृत्यु का दर्ज कारण था।

यह दर्ज है कि बच्चे को 3 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उसकी मृत्यु 10 अगस्त को हुई। हालांकि, उसकी उम्र के संबंध में रिकॉर्ड में विसंगतियां थीं—कुछ अस्पताल दस्तावेजों में सात वर्ष और एक रेडियोलॉजी पर्ची में पांच वर्ष उल्लिखित था। कमिश्नर को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों से प्रारंभिक प्रवेश इतिहास और ब्रेन स्कैन रिपोर्ट भी गायब थीं।

कमिश्नर ने एक स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञ जांच की सिफारिश की ताकि घटना से पहले बच्चे के स्वास्थ्य, गिरने और दौरे पड़ने की परिस्थितियों, और क्या तत्काल चिकित्सीय ध्यान और उचित उपचार प्रदान किया गया था, का पता लगाया जा सके। हालांकि, रिपोर्ट में लापरवाही या गलत कार्य के संबंध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया।

निरीक्षण ने रायपुर केंद्रों में चिकित्सा पर्यवेक्षण में महत्वपूर्ण कमियां भी उजागर कीं। हालांकि दिशानिर्देशों के अनुसार योग्य चिकित्सकों को सप्ताह में दो बार दौरा करना और नर्सों या पैरामेडिकल कर्मियों को चौबीसों घंटे उपलब्ध रहना आवश्यक है, चिकित्सा रजिस्टरों में पिछले तीन महीनों के दौरान महीने में केवल एक या दो चिकित्सक दौरे दिखाए गए। 24 घंटे नर्सिंग या पैरामेडिकल सहायता या नियमित मनोचिकित्सकीय समीक्षा के कोई रिकॉर्ड नहीं मिले।

कमिश्नर ने आगे बताया कि चिकित्सा रजिस्टरों में कैदियों में देखे गए लक्षणों, उनकी बीमारियों का पहली बार पता चलने का समय, या कुमारी बाई, शोभा और मीना के मामलों में अस्पताल में भर्ती होने से पहले क्या चिकित्सीय सहायता प्रदान की गई, का पर्याप्त दस्तावेजीकरण नहीं किया गया था।

बिलासपुर घरौंदा में एक और परेशान करने वाला तथ्य सामने आया, जहां एक पुरुष कैदी को उसके बिस्तर के चारों कोनों से बांधा गया पाया गया। कर्मचारियों ने कथित तौर पर उसे “हाइपर” बताया और कहा कि वह कुछ भी कर सकता है। कैदी की तस्वीर लकड़ी के खटिया पर रखी थर्मोकोल शीट पर निर्वस्त्र लेटे हुए ली गई, जिसकी कलाई कपड़े के टुकड़े से खटिया के पाये से बंधी थी।

पूछताछ पर प्रबंधक ने कहा कि कैदी को लगभग आधे घंटे तक बांधा गया था। कमिश्नर के आग्रह पर उसे छोड़ दिया गया। इसके बाद कैदी शौचालय गया और फिर भोजन की प्रतीक्षा कर रहे अन्य निवासियों के साथ बैठ गया। कमिश्नर ने देखा कि बंधे रहने के दौरान वह शौचालय जाने की अपनी आवश्यकता व्यक्त करने में असमर्थ प्रतीत हुआ। शारीरिक बंधन को अधिकृत करने वाली कोई चिकित्सीय सलाह या रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।

बिलासपुर निरीक्षण में यह भी पाया गया कि कैदियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य रिकॉर्ड नहीं रखे जाते थे। चिकित्सा रजिस्टर में केवल 14 अगस्त और 12 सितंबर की सामान्य प्रविष्टियां थीं, जिनमें व्यक्तिगत परीक्षण नोट्स और प्रगति रिपोर्ट के बजाय सामान्य समीक्षा और दवाओं का नुस्खा दर्ज था। सप्ताह में दो चिकित्सक दौरों के निर्धारित मानक के मुकाबले महीने में केवल एक सामान्य समीक्षा दर्ज की गई।

कोर्ट कमिश्नरों ने यह भी बताया कि बिलासपुर केंद्रों में कैदियों को परोसा गया भोजन खराब गुणवत्ता का और अपर्याप्त मात्रा में था, जबकि शौचालय की स्वच्छता असंतोषजनक थी। रिपोर्ट में कहा गया कि अपर्याप्त भोजन व्यवस्था के बावजूद निवासियों को कई मनोचिकित्सकीय दवाइयां दी जा रही थीं।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को विस्तृत निर्देश प्राप्त कर दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। राज्य से यह भी जांच करने को कहा गया कि क्या कमिश्नरों को संबंधित घरौंदा केंद्रों में लगे सीसीटीवी कैमरों तक पहुंच प्रदान की जा सकती है।

न्यायालय ने आगे संबंधित जिलों के नोडल अधिकारियों और घरौंदा केंद्रों के प्रभारियों को निर्देश दिया कि वे कोर्ट कमिश्नरों के साथ मासिक रिपोर्ट साझा करें ताकि बेहतर निगरानी हो सके और 5 मार्च 2019 को सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों के खंड 28 और 30 के अनुसार न्यायालय की सहायता की जा सके।

ये निर्देश कोपल वाणी चाइल्ड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन, रायपुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका और दो संबंधित रिट याचिकाओं के जवाब में जारी किए गए।