बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 47 वर्षीय महिला को IVF/ART उपचार की अनुमति देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 के तहत निर्धारित आयु सीमा में है और चिकित्सकीय रूप से उपचार के लिए उपयुक्त है, तो केवल इस आधार पर उसका उपचार नहीं रोका जा सकता कि पति की उम्र 55 वर्ष से अधिक हो गई है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 6 अक्टूबर 2026 को Archana Tiwari & Another v. State of Chhattisgarh & Others, WPC No. 4926 of 2026 में यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने माना कि ART Act में पति-पत्नी के लिए कोई संयुक्त या Composite Age Limit निर्धारित नहीं है।
मामले के अनुसार, अर्चना तिवारी और उनके पति प्रदीप कुमार तिवारी का विवाह लगभग 22 वर्ष पहले हुआ था, लेकिन उनके कोई जीवित संतान नहीं थी। अर्चना ने वर्ष 2013 में IUI उपचार कराया था और वर्ष 2015 में गर्भधारण हुआ, लेकिन करीब चार महीने बाद गर्भपात हो गया। इसके बाद दंपती ने रायपुर स्थित Aayush Test Tube Baby Centre में IVF/ART उपचार के लिए संपर्क किया। चिकित्सकीय जांच और काउंसलिंग के बाद अर्चना को उपचार के लिए उपयुक्त पाया गया।
विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब उपचार के लिए आवेदन करते समय पति की उम्र लगभग 57 वर्ष थी। ART Act की धारा 21(g) के अनुसार महिला की आयु 21 वर्ष से अधिक और 50 वर्ष से कम तथा पुरुष की आयु 21 वर्ष से अधिक और 55 वर्ष से कम होनी चाहिए। इसी आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने 24 जून 2026 के अभ्यावेदन को 31 जुलाई 2026 के आदेश से खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि धारा 21(g) में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा निर्धारित है। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत पति के आयु मानदंड में अयोग्य होने पर पत्नी भी स्वतः IVF उपचार के लिए अयोग्य हो जाए। उन्होंने यह भी दलील दी कि प्रजनन संबंधी निर्णय और प्रजनन स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वायत्तता का हिस्सा है।
राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि 55 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा ART Act में निर्धारित वैधानिक सुरक्षा है और न्यायालय संसद द्वारा निर्धारित सीमा में अपवाद नहीं बना सकता।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि ART Act में दंपती के लिए कोई संयुक्त आयु सीमा नहीं है। धारा 2(1)(n) में “patients” की परिभाषा में infertility treatment के लिए आने वाले व्यक्ति या दंपती दोनों को शामिल किया गया है। वहीं धारा 21(g) में महिला और पुरुष के लिए आयु सीमा अलग-अलग निर्धारित की गई है।
कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि एक पति या पत्नी की आयु संबंधी अयोग्यता स्वतः दूसरे को भी अयोग्य बना दे। पति की उम्र को पत्नी के उपचार के लिए स्वतः बाधा मानना ऐसा संयुक्त आयु प्रतिबंध पढ़ने के समान होगा, जिसे विधायिका ने कानून में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया है।
कोर्ट ने अपने निर्णय में प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के Suchita Srivastava v. Chandigarh Administration, K.S. Puttaswamy v. Union of India और X2 v. State (NCT of Delhi) जैसे निर्णयों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने माना कि reproductive choice, decisional autonomy और reproductive healthcare व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकार हैं।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 के अस्वीकृति आदेश को निरस्त कर दिया और संबंधित अधिकारियों तथा ART केंद्र को दंपती को IVF/ART उपचार की अनुमति देने का निर्देश दिया। हालांकि उपचार महिला की चिकित्सकीय उपयुक्तता तथा ART Act, संबंधित नियमों और अन्य वैधानिक एवं नैतिक मानकों के अनुपालन के अधीन रहेगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश के तहत उपचार चक्र शुरू होने के बाद महिला की आयु 50 वर्ष हो जाती है, तो केवल इस कारण से चल रहे उपचार चक्र को बंद नहीं किया जाएगा, बशर्ते उपचार चिकित्सकीय रूप से उचित हो और अन्य वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया जा रहा हो। कोर्ट ने ART केंद्र को भी आदेश के अनुरूप उपचार करने के कारण केवल इसी आधार पर दंडात्मक या प्रतिकूल कार्रवाई से संरक्षण दिया है।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाईकोर्ट ने व्यक्ति की आयु-आधारित पात्रता और दंपती की कथित संयुक्त आयु सीमा के बीच स्पष्ट अंतर किया है। कोर्ट ने IVF की कोई असीमित अनुमति नहीं दी है, बल्कि यह कहा है कि प्रशासन ऐसा अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगा सकता जो कानून में स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है। मामले में पत्नी स्वयं निर्धारित आयु सीमा के भीतर थी और चिकित्सकीय रूप से उपचार के लिए उपयुक्त पाई गई थी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राहत इस मामले के विशिष्ट तथ्यों तक सीमित है और ART Act, Rules तथा Regulations की अन्य अनिवार्य शर्तें लागू रहेंगी। इस प्रकार आदेश ने ART कानून के नियामक उद्देश्य और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित किया है।
आदेश 29 सितंबर 2026 को सुरक्षित किया गया था और 6 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। मामला Archana Tiwari & Another v. State of Chhattisgarh & Others, WPC No. 4926 of 2026, 2026:CGHC:43127 है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गगन तिवारी और राज्य की ओर से पैनल लॉयर अनमोल शर्मा उपस्थित हुए।
