हैदराबाद: तेलंगाना हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस पुथिचिरा सैम कोशी ने कहा कि मध्यस्थता (Mediation) देश की न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। खासकर वाणिज्यिक विवादों में पक्षकार अदालत का रुख करने से पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
जस्टिस कोशी तेलंगाना हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा हाईकोर्ट के बार एसोसिएशन हॉल में आयोजित मध्यस्थता पर व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि मध्यस्थता एक स्वैच्छिक और गैर-बाध्यकारी प्रक्रिया है, जिसमें एक निष्पक्ष मध्यस्थ विवाद के पक्षकारों के बीच संवाद स्थापित कर समाधान तक पहुंचने में मदद करता है। मध्यस्थ न तो कोई फैसला सुनाता है और न ही डिक्री या अवॉर्ड पारित करता है।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में गोपनीयता शामिल है। प्रक्रिया के दौरान हुई बातचीत को निजी रखा जाता है, जिससे पक्षकार बिना किसी दबाव के अपनी समस्याओं और संभावित समाधानों पर खुलकर चर्चा कर सकते हैं।
जस्टिस कोशी ने कहा कि पारंपरिक मुकदमेबाजी में अधिक खर्च, लंबा समय और अपील एवं पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं के कारण विवाद लंबे समय तक चलते हैं। इससे अदालतों पर बोझ बढ़ने के साथ-साथ पक्षकारों के आपसी संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं। इसके विपरीत, मध्यस्थता अपेक्षाकृत तेज और लचीले तरीके से विवादों के समाधान का अवसर देती है।
उन्होंने मध्यस्थों के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। न्यायिक अधिकारियों और वकीलों के लिए 40 घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जाता है, जिसमें मध्यस्थता के विभिन्न चरणों, संयुक्त बैठक और अलग-अलग पक्षों के साथ बैठक जैसी प्रक्रियाओं की जानकारी दी जाती है। उन्होंने कहा कि एक कुशल मध्यस्थ को तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी शांत और सकारात्मक माहौल बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए।
जस्टिस कोशी के अनुसार, पारिवारिक और वैवाहिक विवादों, बच्चों की कस्टडी तथा संपत्ति बंटवारे जैसे मामलों में मध्यस्थता विशेष रूप से प्रभावी साबित हो सकती है। श्रम और औद्योगिक विवादों में भी इसका उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने स्थानीय स्तर पर मध्यस्थता को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि सामुदायिक स्तर पर छोटे विवादों का समाधान होने से कई मामले अदालतों तक पहुंचने से रोके जा सकते हैं।
उन्होंने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून ने मध्यस्थता को औपचारिक कानूनी मान्यता दी है तथा प्री-लिटिगेशन और ऑनलाइन मध्यस्थता के माध्यम से इस प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Afcons Infrastructure फैसले को भी भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
जस्टिस कोशी ने वकीलों से अपील की कि वे अपने मुवक्किलों को उपयुक्त मामलों में मध्यस्थता का विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्होंने कहा कि सफल मध्यस्थता दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान प्रदान कर सकती है और विवाद को लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी से बचाया जा सकता है।
कार्यक्रम के बाद तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस सुरेपल्ली नंदा ने भी मध्यस्थता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता लंबी और महंगी मुकदमेबाजी से राहत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने अक्टूबर में प्रस्तावित मध्यस्थता सेमिनार और प्रशिक्षण कार्यक्रम में राज्यभर के अधिवक्ताओं से सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।
जस्टिस नंदा ने कहा कि मध्यस्थता का प्रशिक्षण वकीलों को विवादों को देखने का एक नया दृष्टिकोण देता है और उन्हें अपने मुवक्किलों को अधिक रचनात्मक तरीके से सलाह देने में मदद करता है। कार्यक्रम में एसोसिएशन की कार्यकारिणी के सदस्यों के अलावा वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिवक्ता तथा कोर्ट स्टाफ मौजूद रहे।
