शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी कल्याणकारी परियोजनाओं पर सर्विस टैक्स नहीं, कस्टम्स, एक्साइज एंड सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने ₹1.82 करोड़ की मांग का अधिकांश हिस्सा किया रद्द

Central Excise and Service Tax Appellate Tribunal - CESTAT

चेन्नई: कस्टम्स, एक्साइज एंड सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT) की चेन्नई पीठ ने निर्माण कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और सरकारी कल्याणकारी परियोजनाओं के लिए किए गए निर्माण कार्यों को केवल इस आधार पर व्यावसायिक निर्माण (Commercial Construction) नहीं माना जा सकता कि उनसे कुछ आय अर्जित होती है। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वैच्छिक अनुपालन प्रोत्साहन योजना (VCES), 2013 के तहत स्वीकार की गई घोषणा को निर्धारित वैधानिक समय सीमा समाप्त होने के बाद दोबारा नहीं खोला जा सकता।

यह मामला M/s SSS Constructions द्वारा दायर अपील से जुड़ा था। विभाग ने मई 2008 से सितंबर 2013 की अवधि के लिए कंपनी पर लगभग ₹1.82 करोड़ का सर्विस टैक्स, ब्याज और भारी जुर्माना लगाया था। आरोप था कि कंपनी ने SRM मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड, तमिलनाडु पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन सहित कई संस्थानों के लिए निर्माण कार्य करने के बावजूद देय सर्विस टैक्स का भुगतान नहीं किया। इसके खिलाफ कंपनी ने CESTAT का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान कंपनी ने तर्क दिया कि जिन परियोजनाओं पर टैक्स लगाया गया, उनमें अधिकांश निर्माण कार्य शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए किए गए थे। ऐसे निर्माण कार्यों को Commercial or Industrial Construction Service के दायरे में नहीं लाया जा सकता। कंपनी ने यह भी कहा कि कई परियोजनाएं सरकारी एजेंसियों के लिए थीं और कुछ कार्य उप-ठेकेदार (Sub-Contractor) के रूप में किए गए थे, जहां मुख्य ठेकेदार पहले ही टैक्स का भुगतान कर चुका था।

ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड और पूर्व के न्यायिक फैसलों का अध्ययन करने के बाद माना कि SRM मेडिकल कॉलेज एक मान्यता प्राप्त शैक्षणिक एवं परोपकारी संस्था है। केवल फीस लेने या कुछ सहायक गतिविधियों से आय होने के कारण उसे व्यावसायिक संस्था नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि “केवल शुल्क वसूलने या सहायक आय प्राप्त होने से किसी शैक्षणिक संस्था का स्वरूप व्यावसायिक नहीं हो जाता।” इसलिए ऐसे संस्थानों के लिए किए गए निर्माण कार्य पर सर्विस टैक्स नहीं लगाया जा सकता।

तमिलनाडु पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन और तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड की परियोजनाओं के संबंध में भी ट्रिब्यूनल ने विभाग की दलील खारिज कर दी। विभाग का कहना था कि परियोजनाओं में कैंटीन या छोटी दुकान जैसी सुविधाएं होने से उनका स्वरूप व्यावसायिक हो गया। इस पर ट्रिब्यूनल ने कहा कि “सहायक सुविधाएं किसी परियोजना के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकतीं।” अदालत ने माना कि पुलिस आवास, प्रशिक्षण केंद्र और झुग्गी पुनर्वास जैसी परियोजनाएं सार्वजनिक कल्याण के लिए होती हैं और इन्हें व्यावसायिक निर्माण नहीं कहा जा सकता।

ट्रिब्यूनल ने Notification No. 30/2012-ST के तहत लागू Reverse Charge Mechanism का भी उल्लेख किया और कहा कि विभाग ने इस कानूनी व्यवस्था की अनदेखी की। साथ ही यह भी माना कि यदि मुख्य परियोजना गैर-व्यावसायिक है तो उप-ठेकेदार द्वारा किया गया कार्य भी उसी प्रकृति का माना जाएगा और उस पर दोबारा टैक्स नहीं लगाया जा सकता।

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू Voluntary Compliance Encouragement Scheme (VCES), 2013 भी था। कंपनी ने इस योजना के तहत पहले ही अपनी घोषणा दाखिल की थी, जिसे विभाग ने स्वीकार कर लिया था। बाद में विभाग ने उसे “Substantially False” बताते हुए दोबारा कार्रवाई शुरू कर दी। ट्रिब्यूनल ने इसे कानून के विपरीत बताते हुए कहा कि VCES एक एकमुश्त कर माफी योजना थी, जिसका उद्देश्य करदाताओं को अंतिम राहत और कानूनी निश्चितता प्रदान करना था। यदि विभाग निर्धारित समय सीमा के भीतर घोषणा को चुनौती नहीं देता, तो बाद में उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “केवल इसलिए कि विभाग बाद में अधिक कर देयता का आकलन कर ले, किसी स्वीकृत VCES घोषणा को ‘Substantially False’ नहीं माना जा सकता।” ट्रिब्यूनल ने कहा कि ऐसी व्याख्या करने से योजना का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

सीमाबद्धता (Limitation) के मुद्दे पर भी ट्रिब्यूनल ने कंपनी को राहत दी। अदालत ने पाया कि लाभ-हानि खाते और ST-3 रिटर्न के बीच जो अंतर बताया गया था, वह केवल मिलान (Reconciliation) और राउंडिंग ऑफ का था। कंपनी ने शो-कॉज नोटिस जारी होने से पहले ही पूरा कर जमा कर दिया था। इसलिए विभाग यह साबित नहीं कर सका कि कर चोरी या तथ्यों को छिपाने का कोई जानबूझकर प्रयास किया गया था। इस आधार पर विस्तारित समय सीमा लागू करने और जुर्माना लगाने को भी अवैध माना गया।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने SRM Engineering Construction Corporation Limited से संबंधित एक सीमित हिस्से में कंपनी द्वारा स्वयं स्वीकार की गई कर देयता को बरकरार रखा। यह देयता Reverse Charge Mechanism के तहत थी और इस पर लागू ब्याज के साथ कर का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा विभाग की शेष सर्विस टैक्स मांग और सभी संबंधित दंड रद्द कर दिए गए। अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

यह फैसला निर्माण कंपनियों, ठेकेदारों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी निर्माण परियोजना की कर देयता तय करते समय उसके वास्तविक उद्देश्य और स्वरूप को देखा जाएगा, न कि केवल इस आधार पर कि उससे किसी प्रकार की आय होती है। साथ ही यह निर्णय VCES जैसी कर माफी योजनाओं के तहत दी गई वैधानिक अंतिमता (Finality) को भी मजबूत करता है।