कोरिया सत्र न्यायालय ने 15 लीटर महुआ शराब मामले में राज्य की अपील खारिज कर आरोपी की दोषमुक्ति बरकरार रखी।

The Rajpatra

कोरिया जिले के बैकुंठपुर स्थित सत्र न्यायालय ने छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम के एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी अनिल कुजूर को दी गई दोषमुक्ति को बरकरार रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब किसी आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला गया हो, तब केवल वैकल्पिक दृष्टिकोण संभव होने के आधार पर अपीलीय अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह फैसला आबकारी अपराधों में जब्ती, साक्ष्य संरक्षण और स्वतंत्र गवाहों की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामले के अनुसार 12 मार्च 2024 को थाना चरचा क्षेत्र में आबकारी विभाग को मुखबिर से सूचना मिली थी कि अनिल कुजूर नामक व्यक्ति स्टेट बैंक चरचा के सामने लगभग 15 लीटर महुआ शराब बिक्री के लिए अपने कब्जे में रखे हुए है। सूचना के आधार पर आबकारी अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर कथित रूप से 15 लीटर हाथ भट्ठी से निर्मित महुआ शराब बरामद की थी। आरोपी को नोटिस जारी किया गया, लेकिन वह शराब रखने अथवा बेचने का कोई वैध लाइसेंस या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद उसके खिलाफ छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत अपराध दर्ज कर जांच शुरू की गई।

विवेचना के दौरान जब्त शराब का परीक्षण कराया गया, जिसमें उसे महुआ आधारित कच्ची शराब बताया गया। इसके बाद अभियोजन ने आरोपी के विरुद्ध मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बैकुंठपुर की अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत किया। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने कई दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य पेश किए तथा जब्ती, गिरफ्तारी और परीक्षण संबंधी रिकॉर्ड न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। हालांकि, मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब जब्ती प्रक्रिया के दौरान मौजूद बताए गए दोनों स्वतंत्र गवाह रामनाथ पांडेय और राजनारायण ने अदालत में अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। दोनों गवाहों को पक्षद्रोही घोषित किया गया, लेकिन उन्होंने केवल इतना स्वीकार किया कि उनके हस्ताक्षर थाने में लिए गए थे। उन्होंने कथित बरामदगी और जब्ती की कार्यवाही की पुष्टि नहीं की।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि जब्त की गई शराब को विधिवत सीलबंद रखा गया था और वही सामग्री परीक्षण के लिए भेजी गई थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि परीक्षण रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं था कि सील किसकी उपस्थिति में खोली गई और परीक्षण की प्रक्रिया किस प्रकार अपनाई गई। इन परिस्थितियों में ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए 18 अक्टूबर 2024 को आरोपी को दोषमुक्त कर दिया था।

ट्रायल कोर्ट के इस निर्णय को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सत्र न्यायालय में आपराधिक अपील दायर की। राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि जब्ती पत्रक, मालखाना रजिस्टर, रवानगी और वापसी सान्हा तथा आबकारी परीक्षण रिपोर्ट जैसे दस्तावेज अभियोजन के मामले को पर्याप्त रूप से सिद्ध करते हैं। राज्य ने यह भी कहा कि केवल तकनीकी या औपचारिक कमियों के आधार पर दोषमुक्ति नहीं दी जानी चाहिए और अभियोजन को अपना मामला “संदेह से परे” सिद्ध करना होता है, न कि “हर प्रकार के संदेह से परे”।

सत्र न्यायाधीश योगेश पारीक ने अपील की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें जफरुद्दीन बनाम केरल राज्य तथा बाबू साहेबगौड़ा रुद्रगौदर बनाम कर्नाटक राज्य के फैसले शामिल हैं। अदालत ने कहा कि दोषमुक्ति के मामलों में आरोपी के पक्ष में “दोहरी निर्दोषता की उपधारणा” लागू होती है। पहली उपधारणा संविधानसम्मत आपराधिक न्यायशास्त्र के तहत आरोपी को प्राप्त होती है और दूसरी तब उत्पन्न होती है जब ट्रायल कोर्ट उसे दोषमुक्त कर देता है। ऐसे मामलों में अपीलीय अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण पूरी तरह असंगत, मनमाना या साक्ष्यों के विपरीत हो।

अदालत ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि अभिलेख पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर दो तर्कसंगत निष्कर्ष संभव हैं, तो अपीलीय न्यायालय को विचारण न्यायालय द्वारा दर्ज दोषमुक्ति के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।” न्यायालय ने यह भी कहा कि “दोषमुक्ति के बाद अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषता की उपधारणा और अधिक सुदृढ़ हो जाती है।”

सत्र न्यायालय ने पाया कि स्वतंत्र गवाहों द्वारा अभियोजन का समर्थन नहीं किया जाना, जब्त शराब की सील और अभिरक्षा को लेकर उत्पन्न संदेह तथा परीक्षण प्रक्रिया से जुड़े प्रश्न ऐसे कारक हैं जिनके आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण एक संभावित और तर्कसंगत दृष्टिकोण माना जा सकता है। इसलिए केवल इसलिए कि किसी अन्य निष्कर्ष तक भी पहुंचा जा सकता था, दोषमुक्ति आदेश को पलटा नहीं जा सकता।

अंततः अदालत ने राज्य सरकार की आपराधिक अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 18 अक्टूबर 2024 को पारित दोषमुक्ति आदेश की पुष्टि कर दी। इस फैसले के साथ आरोपी अनिल कुजूर को आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के आरोपों से मिली राहत बरकरार रहेगी।