सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को उत्तर प्रदेश में दर्ज रोड-रेज से जुड़े मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए उपाध्याय की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही और एफआईआर को रद्द करने की मांग की है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे, ने निर्देश दिया कि उपाध्याय के खिलाफ दर्ज एफआईआर या उसी कथित घटना से संबंधित किसी अन्य मामले में फिलहाल कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जाए। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 सितंबर की तारीख तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज एफआईआर की पूरी प्रति पत्रकार को उपलब्ध कराई जाए। साथ ही गाजियाबाद के पुलिस अधीक्षक को अनुपालन रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया है।
यह मामला 18 अगस्त को एक दोपहिया वाहन चालक की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उपाध्याय की कार ने उसकी मोटरसाइकिल को पीछे से टक्कर मारी और कथित घटना के बाद पत्रकार ने उसे धमकाया तथा गाली-गलौज की। एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधान भी लगाए गए हैं।
उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और पत्रकार की खोजी रिपोर्टिंग के कारण उन्हें निशाना बनाने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने दावा किया कि अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े चंदे और ट्रस्ट के कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं पर रिपोर्ट प्रकाशित करने के बाद उपाध्याय के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की गई।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि उपाध्याय अपनी नाबालिग बेटी को स्कूल से लेकर घर लौट रहे थे, तभी एक मोटरसाइकिल सवार ने कथित तौर पर उनकी कार के पास आकर विवाद खड़ा किया। उपाध्याय का दावा है कि बेटी के कार में मौजूद होने के कारण उन्होंने किसी तरह के टकराव से बचने की कोशिश की और स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। याचिका के अनुसार, न तो कोई टक्कर हुई और न ही दोनों पक्षों के बीच कोई शारीरिक विवाद हुआ।
वरिष्ठ अधिवक्ता राय ने कोर्ट के समक्ष यह भी कहा कि घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज मामले की सच्चाई सामने लाने में महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा आसपास के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से सीसीटीवी फुटेज के संबंध में संपर्क किए जाने के कारण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के संरक्षण को लेकर चिंता पैदा हुई है। याचिका में संबंधित फुटेज को सुरक्षित रखने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
याचिका में मोटरसाइकिल के स्वामित्व को लेकर भी कथित विसंगति का उल्लेख किया गया है। उपाध्याय का दावा है कि जिस व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई, उसके नाम पर संबंधित दोपहिया वाहन पंजीकृत नहीं था।
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी वाहन चालक ने मोटरसाइकिल को टक्कर मारने के बाद उसके सवार के साथ जातिसूचक दुर्व्यवहार किया हो, तो ऐसी स्थिति में आपराधिक प्रावधान लागू हो सकते हैं और मामले की जांच जरूरी होगी।
उपाध्याय ने अपनी याचिका में इस एफआईआर को अपने खोजी पत्रकारिता कार्य से जोड़ते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें डराने और उनकी रिपोर्टिंग को प्रभावित करने के उद्देश्य से आपराधिक मामला दर्ज कराया गया। उन्होंने राम मंदिर से जुड़े दान और अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के संबंध में कथित अनियमितताओं के अलावा उत्तर प्रदेश के एक आईएएस अधिकारी से संबंधित रिपोर्ट का भी हवाला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। कोर्ट ने केवल अंतरिम संरक्षण देते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अब 7 सितंबर को होने वाली सुनवाई में उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष सामने आने के बाद मामले की आगे की दिशा स्पष्ट होगी।
