नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर Cockroach Janata Party (CJP) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर लगाए गए कथित ज्यादती के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति के पुनर्गठन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया गया है। आवेदन पर मंगलवार, 25 अगस्त को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उल्लेख किया गया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व डीजीपी एल.आर. बिश्नोई को शामिल किया गया है।
आवेदन का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत से इसे अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने आवेदन के पीछे राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे शरारतपूर्ण आवेदन बताया और कहा कि इसे मुख्य मामले के साथ ही सुना जाना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल ने विशेष रूप से समिति में बदलाव किए जाने और कुछ व्यक्तियों को समिति में शामिल करने या नेतृत्व की भूमिका देने से जुड़ी मांगों पर आपत्ति जताई। उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि न्यायालय कोई राजनीतिक मंच नहीं है और आवेदन में बताए गए तथ्य विश्वसनीय नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने आवेदन की सटीक सामग्री सार्वजनिक रूप से नहीं बताई।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी आवेदन में व्यक्तियों के नामों का उल्लेख किए जाने पर नाराजगी जताई। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने स्पष्ट किया कि वह केवल आवेदन को सूचीबद्ध कराने की मांग कर रहे हैं और अदालत के समक्ष किसी नाम पर जोर नहीं देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः निर्देश दिया कि समिति के पुनर्गठन की मांग वाले आवेदन की सुनवाई उन मुख्य याचिकाओं के साथ की जाएगी, जिनमें CJP प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस ज्यादती और उससे जुड़े अन्य मुद्दों को उठाया गया है। मामले की अगली सुनवाई सितंबर में होने की संभावना है।
CJP के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन जून में शुरू हुए थे। प्रदर्शनकारी प्रवेश परीक्षाओं, विशेष रूप से राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET), में बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन में शामिल होने और समर्थन में भूख हड़ताल शुरू करने के बाद प्रदर्शन और तेज हो गया था।
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने के लिए ‘संसद चलो’ अभियान शुरू किया था। इस दौरान दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज, आंसू गैस और कथित तौर पर पेलेट गन के इस्तेमाल के आरोप सामने आए। इसके बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त कर दिए गए।
बिहार में भी इसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन हुए थे, जहां पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग करने के आरोप लगे। प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी के कथित तौर पर AK-47 राइफल के साथ नजर आने का मामला भी सामने आया था। इन घटनाओं के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग की न्यायिक जांच और हस्तक्षेप की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं।
