इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निजी संपत्तियों से ईरानी शिया धार्मिक नेताओं के चित्र हटाने से रोकने संबंधी जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिका केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों पर आधारित है तथा इसमें ऐसे ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं जिनके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप किया जा सके।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मजलिस उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना सैयद कल्बे जवाद नकवी द्वारा दायर याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि जनहित याचिका में पुलिस कार्रवाई का कोई विशिष्ट उदाहरण या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पुलिस शिया समुदाय द्वारा धार्मिक शोक सभाओं के दौरान प्रदर्शित किए जाने वाले ईरानी शिया आध्यात्मिक नेताओं, जिनमें दिवंगत आयतुल्ला सैयद अली खामेनेई, आयतुल्ला सैयद अली अल-सिस्तानी तथा अन्य धार्मिक नेताओं के चित्र, बैनर और पोस्टर शामिल हैं, उन्हें हटाने के लिए दबाव बना रही है। याचिका में यह भी कहा गया कि शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजनों में शामिल लोगों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा रही है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन हो रहा है।
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया था कि उत्तर प्रदेश के सभी जिला पुलिस प्रमुखों, पुलिस अधीक्षकों और थाना प्रभारियों को निर्देश दिया जाए कि वे निजी आवासों और व्यावसायिक परिसरों पर लगाए गए धार्मिक नेताओं के चित्रों को हटाने या शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजनों में भाग लेने वालों के विरुद्ध कोई दमनात्मक कार्रवाई न करें। साथ ही 12 जून 2026 को राज्य सरकार को दिए गए अभ्यावेदनों पर निर्णय लेने का भी निर्देश मांगा गया था।
खंडपीठ ने याचिका का परीक्षण करते हुए पाया कि इसमें कहीं भी यह नहीं बताया गया कि किस स्थान पर, किस व्यक्ति के घर या प्रतिष्ठान से पुलिस ने चित्र हटाए, कब ऐसी कार्रवाई हुई और किस अधिकारी ने यह कदम उठाया। अदालत ने कहा कि केवल व्यापक और सामान्य आरोपों के आधार पर जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति के साथ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा वास्तव में अवैध कार्रवाई की गई है तो वह कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है। लेकिन बिना किसी ठोस तथ्य, दस्तावेज या विशिष्ट घटना के पूरे राज्य की पुलिस के विरुद्ध व्यापक निर्देश जारी नहीं किए जा सकते।
इन्हीं कारणों से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनहित याचिका में कोई राहत देने से इनकार करते हुए उसका निस्तारण कर दिया। अदालत ने दोहराया कि जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप तभी संभव है जब आरोपों के समर्थन में स्पष्ट, सत्यापित और ठोस तथ्य उपलब्ध हों।
