₹3 लाख के चेक बाउंस मामले में कंपनी की अपील खारिज, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी रखने का आदेश

JUSTICE SANJAY AGRAWAL, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चेक अनादरण से जुड़े करीब 18 साल पुराने मामले में Vandana Global Limited की अपील खारिज करते हुए Subhash Chouhan को बरी किए जाने के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि कंपनी अपने मामले को ऐसे अधिकृत और सक्षम प्रतिनिधि के माध्यम से साबित करने में सफल नहीं रही, जिसे संबंधित लेनदेन की वास्तविक जानकारी हो। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल ने यह फैसला 17 अगस्त 2026 को ACQA No. 295 of 2017 में सुनाया है।

मामला लोहे की आपूर्ति से जुड़े व्यावसायिक लेनदेन से शुरू हुआ था। रिकॉर्ड के अनुसार Vandana Global Limited ने 6 अक्टूबर 2007 को M/s Cheery Commercials, जिसका बाद में नाम M/s Minal Traders हुआ, को 3,600 मीट्रिक टन लौह अयस्क की आपूर्ति का ऑर्डर दिया था। कंपनी ने इसके लिए 81 लाख रुपये अग्रिम भुगतान किया, लेकिन उसे केवल 1,880 मीट्रिक टन लौह अयस्क की आपूर्ति की गई। इसके बाद 28 मई 2008 को दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई, जिसमें बकाया राशि के भुगतान को लेकर समझौता हुआ और प्रतिवादी की ओर से 79,92,612 रुपये किस्तों में चुकाने पर सहमति व्यक्त की गई।

इसी कथित बकाया देनदारी के आंशिक भुगतान के लिए 14 जून 2008 को 3 लाख रुपये का चेक जारी किया गया। कंपनी ने चेक को अपने बैंक खाते में प्रस्तुत किया, लेकिन 24 नवंबर 2008 को चेक “not arranged for” टिप्पणी के साथ अनादरित हो गया। इसके बाद कंपनी ने 1 दिसंबर 2008 को मांग नोटिस जारी किया, जिसे प्रतिवादी ने लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद कंपनी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।

मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने 3 अप्रैल 2017 को Subhash Chouhan को धारा 138 के अपराध का दोषी माना। अदालत ने उसे छह महीने के साधारण कारावास और 5 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना अदा नहीं करने पर चार महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का प्रावधान किया गया था। हालांकि, आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की। चौथे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, रायपुर ने 16 अगस्त 2017 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट में मुख्य सवाल यह था कि कंपनी की ओर से गवाही देने वाले Ajay Tipte क्या कंपनी के मामले को साबित करने के लिए सक्षम और अधिकृत प्रतिनिधि थे। कंपनी की ओर से दलील दी गई कि प्रबंध निदेशक द्वारा जारी अधिकार पत्र के आधार पर Tipte को कंपनी की ओर से कार्य करने के लिए अधिकृत किया गया था। कंपनी ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के TRL Krosaki Refractories Limited v. SMS Asia Private Limited and Another, (2022) 7 SCC 612 के फैसले का हवाला दिया।

वहीं, प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि Ajay Tipte को कंपनी के निदेशक मंडल ने इस आपराधिक मामले में प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत नहीं किया था। इसके अलावा उन्हें उस समय हुए मूल लेनदेन की कोई व्यक्तिगत जानकारी भी नहीं थी। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के A.C. Narayanan v. State of Maharashtra and Another, (2014) 11 SCC 790 के फैसले पर भरोसा किया।

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल ने रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों की विस्तृत जांच के बाद पाया कि मूल शिकायत कंपनी की ओर से Rabindra Nath Shahi ने दाखिल की थी। उन्हें 20 जनवरी 2009 को कंपनी के निदेशक मंडल के प्रस्ताव और उसके आधार पर जारी पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से शिकायत दाखिल करने के लिए अधिकृत किया गया था। हालांकि, बाद की कार्यवाही में वे लगातार अदालत में उपस्थित होकर साक्ष्य दर्ज कराने में असफल रहे।

कोर्ट ने पाया कि पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद Rabindra Nath Shahi ने शिकायत के समर्थन में गवाही नहीं दी। लगभग पांच वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी उनकी ओर से साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके स्थान पर Ajay Tipte को कंपनी की ओर से गवाह के रूप में पेश किया गया।

हाईकोर्ट के अनुसार Ajay Tipte के संबंध में रिकॉर्ड से यह स्थापित नहीं हुआ कि उन्हें कंपनी के निदेशक मंडल ने इस विशेष चेक अनादरण मामले में कंपनी का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत किया था। कोर्ट ने यह भी पाया कि वह संबंधित लेनदेन के समय कंपनी में कार्यरत होने के संबंध में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। उनकी जिरह से यह भी सामने आया कि उन्हें वर्ष 2013 में अधिकार पत्र मिलने के बाद ही इस लेनदेन के बारे में जानकारी हुई थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति के पास कंपनी के प्रबंध निदेशक द्वारा जारी अधिकार पत्र होना पर्याप्त नहीं था, खासकर तब जब वह व्यक्ति उस लेनदेन से परिचित ही न हो जिसके आधार पर आपराधिक शिकायत दायर की गई है। न्यायालय ने माना कि कंपनी के मामले को साबित करने वाले प्रतिनिधि के पास आवश्यक अधिकार के साथ-साथ मामले के मूल तथ्यों और लेनदेन की जानकारी भी होनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया कि क्या मूल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के कार्यवाही से अलग हो जाने के बाद शिकायत को किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता था। कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि Rabindra Nath Shahi को कंपनी के निदेशक मंडल ने विशेष रूप से इस मामले में अधिकृत किया था, लेकिन उन्होंने आगे की कार्यवाही में साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। बाद में Ajay Tipte को पेश किया गया, जबकि उनके अधिकार को विधिवत स्थापित नहीं किया जा सका।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के A.C. Narayanan फैसले को भी मौजूदा मामले से अलग माना। हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले में शिकायतकर्ता एक व्यक्तिगत व्यक्ति था और पावर ऑफ अटॉर्नी धारक की भूमिका उसी संदर्भ में देखी गई थी। वर्तमान मामले में शिकायतकर्ता एक कंपनी थी। इसलिए कंपनी के प्रतिनिधित्व से संबंधित सिद्धांतों को अलग संदर्भ में देखना आवश्यक था।

इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने TRL Krosaki Refractories के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब शिकायतकर्ता कोई कंपनी या कॉरपोरेट संस्था होती है, तो उसके प्रतिनिधित्व की स्थिति को व्यक्तिगत शिकायतकर्ता से अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में Ajay Tipte न तो निदेशक मंडल द्वारा विधिवत अधिकृत साबित हुए और न ही संबंधित लेनदेन की जानकारी रखने वाले व्यक्ति के रूप में स्थापित हो सके। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का लाभ भी कंपनी को नहीं मिल सकता था।

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 चेक के अनादरण को अपराध बनाती है, जब चेक किसी विधि द्वारा प्रवर्तनीय ऋण या देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया हो और कानून में निर्धारित अन्य शर्तें पूरी होती हों। ऐसे मामलों में चेक का अनादरण, निर्धारित समय में भुगतान की मांग वाला नोटिस और उसके बाद भुगतान न किया जाना महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। लेकिन वर्तमान फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि शिकायतकर्ता कंपनी को अपने मामले को सक्षम साक्ष्य और उचित रूप से अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से साबित करना आवश्यक है।

इस फैसले का कॉरपोरेट संस्थाओं के लिए व्यावहारिक महत्व है। किसी कंपनी की ओर से चेक बाउंस की शिकायत दाखिल करते समय केवल शिकायत दाखिल कर देना पर्याप्त नहीं है। कंपनी को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस व्यक्ति को मामले को आगे बढ़ाने और साक्ष्य देने के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है, उसके अधिकार स्पष्ट रूप से स्थापित हों और वह संबंधित लेनदेन तथा शिकायत के तथ्यों से पर्याप्त रूप से परिचित हो।

हाईकोर्ट ने अंततः Vandana Global Limited की अपील को गुणहीन पाते हुए खारिज कर दिया। परिणामस्वरूप Subhash Chouhan को बरी करने वाला सत्र अदालत का फैसला कायम रहा। यह निर्णय विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायतें दाखिल करती हैं, क्योंकि यह विधिवत कॉरपोरेट प्राधिकरण, पावर ऑफ अटॉर्नी और गवाह की लेनदेन संबंधी जानकारी के महत्व को रेखांकित करता है।

मामला: Vandana Global Limited v. Subhash Chouhan
प्रकरण संख्या: ACQA No. 295 of 2017