बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 23 साल पुराने रिश्वत मामले में पूर्व पटवारी माधव सिंह चंदेल की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी सजा में आंशिक कमी की है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने कहा कि रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति अभियोजन द्वारा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित की गई है। हालांकि, आरोपी की वर्तमान उम्र 73 वर्ष और घटना को बीते करीब 23 वर्ष को देखते हुए हाईकोर्ट ने कारावास की अवधि कम कर दी।
यह फैसला क्रिमिनल अपील नंबर 536/2017 में 17 अगस्त 2026 को सुनाया गया। मामला दुर्ग जिले में पदस्थ तत्कालीन पटवारी माधव सिंह चंदेल से जुड़ा है। विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, दुर्ग ने 30 मार्च 2017 को उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने धारा 7 के अपराध में एक वर्ष और धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के अपराध में दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।
अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता अर्जुन साहू ने एंटी करप्शन ब्यूरो, रायपुर में शिकायत की थी कि उसकी मां द्वारा लगभग 20 वर्ष पहले खरीदी गई जमीन के संबंध में आवश्यक सत्यापन या राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े कार्य के लिए तत्कालीन पटवारी ने 2,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि जमीन के बंटवारे और राजस्व रिकॉर्ड में खाता विभाजन से जुड़े पहले के काम के लिए 5,000 रुपये दिए जा चुके थे।
शिकायत के आधार पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने ट्रैप की कार्रवाई की। 31 दिसंबर 2003 को शिकायतकर्ता पटवारी के कार्यालय पहुंचा और अभियोजन के अनुसार उसने 2,000 रुपये की रिश्वत दी। इन नोटों पर फिनॉल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था। शिकायतकर्ता द्वारा संकेत दिए जाने के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने कार्यालय में प्रवेश किया और पटवारी को पकड़ लिया। तलाशी के दौरान रिश्वत की रकम एक बैग से बरामद हुई। रासायनिक परीक्षण के दौरान सोडियम कार्बोनेट के घोल का रंग गुलाबी हो गया। इसके बाद जांच पूरी कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया।
हाईकोर्ट में अपील के दौरान पूर्व पटवारी की ओर से दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए कई तर्क रखे गए। बचाव पक्ष ने कहा कि रिश्वत की कथित मांग को रिकॉर्ड करने के लिए दिए गए टेप रिकॉर्डर की रिकॉर्डिंग, उसका ट्रांसक्रिप्ट या उससे संबंधित कोई प्राथमिक साक्ष्य अदालत में पेश नहीं किया गया। यह भी तर्क दिया गया कि घटनास्थल पर मौजूद कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों को अभियोजन ने गवाह नहीं बनाया। इसके अलावा, रिश्वत की रकम आरोपी की जेब से बरामद नहीं हुई थी बल्कि उसके पास लटके बैग से मिली थी, इसलिए रकम आरोपी द्वारा स्वीकार किए जाने पर संदेह है।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास हैं और यह स्पष्ट नहीं हुआ कि संबंधित राजस्व कार्य के लिए पटवारी को कानूनी रूप से रिश्वत मांगने का अवसर या अधिकार कैसे था। आरोपी ने अपने बयान में खुद को निर्दोष बताया और दावा किया कि शिकायतकर्ता के रिश्तेदार के साथ उसकी पुरानी रंजिश के कारण उसे झूठा फंसाया गया।
राज्य की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। अभियोजन ने कहा कि शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों के साथ-साथ ट्रैप और बरामदगी की कार्रवाई से रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने की बात साबित होती है। राज्य ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही बताते हुए अपील खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह माना कि क्या अभियोजन रिश्वत की मांग को संदेह से परे साबित कर पाया है। कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(1)(डी) तथा धारा 13(2) के प्रावधानों पर विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामले में केवल रिश्वत की रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं है। दोषसिद्धि के लिए अवैध रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकारोक्ति को स्थापित करना आवश्यक है।
टेप रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने के बचाव पक्ष के तर्क को हाईकोर्ट ने स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर टेप रिकॉर्डर, उसकी रिकॉर्डिंग या उसका ट्रांसक्रिप्शन प्रस्तुत नहीं किया गया था। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मांग का आरोप हर स्थिति में असफल हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले Neeraj Dutta v. State (Government of NCT of Delhi) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने की बात प्रत्यक्ष साक्ष्य के अलावा परिस्थितिजन्य साक्ष्य से भी साबित की जा सकती है।
कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि “रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति साबित करना दोषसिद्धि के लिए आवश्यक है।” लेकिन यदि प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला के आधार पर भी इस तथ्य को साबित किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के A. Karunanithi v. State और State by Lokayukta Police v. Sri K. Rangayya के फैसलों का भी उल्लेख किया।
मामले के साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता अर्जुन साहू अपनी जिरह के दौरान भी रिश्वत की मांग के संबंध में अपने बयान पर कायम रहा। उसने बताया कि उसने आरोपी को रकम दी थी और आरोपी ने रकम अपने बैग में रख ली थी। एक अन्य गवाह मनहरण लाल ने भी कहा कि संबंधित कार्य के लिए 2,000 रुपये की मांग की गई थी और उसने शिकायतकर्ता के साथ आरोपी के कार्यालय जाकर पैसे दिए जाने की प्रक्रिया देखी थी।
ट्रैप से जुड़े गवाह रणवीर सिंह ने भी जब्ती की कार्रवाई, नोटों के नंबरों के मिलान और रासायनिक परीक्षण की प्रक्रिया की पुष्टि की। एक अन्य गवाह सैयद शमीमुद्दीन ने बताया कि आरोपी की कुर्सी से बैग लटका हुआ था और उसी बैग से रकम बरामद की गई। हालांकि उसने यह भी माना कि उसने यह नहीं देखा था कि बैग में रकम किसने रखी थी।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की उस दलील पर भी विचार किया कि संबंधित राजस्व कार्य पटवारी के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। अदालत ने राजस्व रिकॉर्ड और बचाव पक्ष के गवाहों के बयानों का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि बंटवारे के आदेश के बाद राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार और संबंधित व्यक्ति का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया में पटवारी की भूमिका थी। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 109 का भी उल्लेख किया, जिसमें भूमि में अधिकार या हित अर्जित करने की सूचना पटवारी को देने की व्यवस्था है।
इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन ने आरोपी द्वारा रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किए जाने की बात संदेह से परे साबित कर दी है। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 तथा धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी।
इसके बाद अदालत ने सजा की अवधि पर अलग से विचार किया। बचाव पक्ष ने बताया कि आरोपी की उम्र अब 73 वर्ष है, दोषसिद्धि के बाद उसकी सरकारी सेवा समाप्त हो चुकी है और उसे पेंशन तथा ग्रेच्युटी जैसे सेवा लाभ भी नहीं मिले हैं। घटना को करीब 23 वर्ष बीत चुके हैं और आरोपी लंबे समय से मुकदमे का सामना कर रहा है।
राज्य ने सजा कम करने का विरोध करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार करने वाले लोक सेवक के प्रति नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि भ्रष्टाचार समाज को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या है और कानून में निर्धारित न्यूनतम सजा से कम सजा नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी को केवल एक दिन की अवधि तक भुगती गई सजा तक राहत देना कानूनन संभव नहीं है, क्योंकि घटना के समय लागू भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में न्यूनतम सजा का प्रावधान था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Shanti Lal Meena v. State of NCT of Delhi, CBI के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि निर्धारित न्यूनतम सजा से कम अवधि का कारावास नहीं दिया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने आरोपी की उम्र और घटना को बीते 23 वर्ष को महत्वपूर्ण परिस्थितियां माना। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने धारा 7 के तहत एक वर्ष की सजा को घटाकर छह महीने और धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत दो वर्ष की सजा को घटाकर एक वर्ष कर दिया। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी।
इस तरह हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए अपील को केवल सजा की अवधि के स्तर पर आंशिक रूप से स्वीकार किया। चूंकि आरोपी वर्तमान में जमानत पर था, अदालत ने उसके जमानत बांड निरस्त कर दिए और उसे 30 अक्टूबर 2026 को संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया।
यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को रेखांकित करता है। अदालत ने साफ किया कि रिश्वत के मामले में मांग और स्वीकार किए जाने का प्रमाण दोषसिद्धि की बुनियाद है। साथ ही, यदि ऑडियो रिकॉर्डिंग जैसी प्रत्यक्ष सामग्री उपलब्ध नहीं हो, तब भी विश्वसनीय मौखिक साक्ष्य, बरामदगी, ट्रैप की परिस्थितियों और अन्य साक्ष्यों की समग्र श्रृंखला के आधार पर मांग और स्वीकारोक्ति साबित की जा सकती है।
मामले में हाईकोर्ट ने एक ओर भ्रष्टाचार के प्रति कठोर न्यायिक दृष्टिकोण को कायम रखा, वहीं दूसरी ओर आरोपी की अत्यधिक उम्र और मामले के लंबे समय तक लंबित रहने को सजा निर्धारित करते समय ध्यान में रखा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि दोषसिद्धि बरकरार रहने के बावजूद परिस्थितियों के आधार पर सजा की अवधि में न्यायिक हस्तक्षेप संभव है।
