₹14,106 करोड़ OFCD मामले में सेबी पहुंची सुप्रीम कोर्ट, सहारा के अधिकारियों को मिली राहत को दी चुनौती

Supreme Court of India

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सहारा इंडिया कमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SICCL) के ₹14,106 करोड़ के ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर (OFCD) मामले में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) द्वारा चार प्रबंधकों और कंपनी सचिव को दी गई राहत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह मामला करीब 1.98 करोड़ निवेशकों से जुटाई गई धनराशि से जुड़ा है और देश के सबसे चर्चित वित्तीय मामलों में से एक माना जाता है।

सेबी ने अपनी अपील में SAT के 9 मार्च 2026 के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें ट्रिब्यूनल ने प्रबंधकों और कंपनी सचिव पर लगाई गई जिम्मेदारी को निरस्त कर दिया था। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने SICCL, सहारा इंडिया, उसके प्रमोटर और निदेशकों के खिलाफ सेबी की कार्रवाई और निष्कर्षों को बरकरार रखा था। मामले की सुनवाई 18 जून को सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष होने की संभावना है।

मामला सहारा समूह की कंपनियों द्वारा OFCD के माध्यम से धन जुटाने की प्रक्रिया से जुड़ा है। सेबी के अनुसार, SICCL ने जुलाई 1998 से जून 2008 के बीच लगभग 1.98 करोड़ निवेशकों से ₹14,106 करोड़ जुटाए थे। नियामक का आरोप है कि यह फंड जुटाने की प्रक्रिया कंपनी अधिनियम, 1956 और प्रतिभूति बाजार से संबंधित कानूनों के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए संचालित की गई।

SICCL ने अपनी दलील में कहा था कि OFCD निजी प्लेसमेंट के जरिए चुनिंदा निवेशकों को जारी किए गए थे और इसलिए उन्हें सार्वजनिक निर्गम (पब्लिक इश्यू) नहीं माना जा सकता। कंपनी का तर्क था कि इस कारण उस पर सार्वजनिक निर्गम से संबंधित वैधानिक नियम लागू नहीं होते।

हालांकि, सेबी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि ऑफर केवल सीमित और पूर्व-निर्धारित व्यक्तियों तक ही सीमित था। सेबी के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में निवेशकों से धन जुटाना स्पष्ट रूप से सार्वजनिक निर्गम की श्रेणी में आता है और इस पर प्रतिभूति कानून लागू होते हैं।

SAT ने भी SICCL की दलीलों को खारिज करते हुए माना कि कंपनी ने लगभग दो करोड़ निवेशकों को OFCD जारी किए थे। ट्रिब्यूनल ने कहा कि निवेशकों की संख्या कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 67(3) में निर्धारित सीमा से कहीं अधिक थी, इसलिए इसे सार्वजनिक निर्गम माना जाएगा।

ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि SICCL ने निर्गम शुरू करने से पहले किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज से अनुमति नहीं ली थी और न ही सेबी अधिनियम की धारा 12(1-B) के तहत आवश्यक पंजीकरण कराया था। इन कारणों से SAT ने सेबी के अधिकार क्षेत्र और उसके निष्कर्षों को सही ठहराया।

SICCL ने यह भी दावा किया था कि निवेशकों को अधिकांश राशि वापस कर दी गई थी या उसे इक्विटी में परिवर्तित कर दिया गया था। लेकिन SAT ने कहा कि कंपनी लगभग 1.98 करोड़ निवेशकों को भुगतान किए जाने के पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट का प्रमाणपत्र इतनी बड़ी संख्या में निवेशकों को भुगतान साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने चार प्रबंधकों और कंपनी सचिव को राहत देते हुए कहा कि उन्हें कंपनी अधिनियम की धारा 73 के तहत पहले ही “ऑफिसर इन डिफॉल्ट” के रूप में जिम्मेदारी से मुक्त किया जा चुका था। SAT ने माना कि प्रबंधक वेतनभोगी कर्मचारी थे और कंपनी तथा उसके निदेशकों के निर्णयों के लिए उन्हें स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कंपनी सचिव के संबंध में ट्रिब्यूनल ने कहा कि उन्होंने निदेशकों द्वारा दिए गए पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर प्रॉस्पेक्टस पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में कानूनी जिम्मेदारी निदेशकों की ही बनती है, क्योंकि वे मूल निर्णय लेने वाले पक्ष थे।

अब सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर मांग की है कि प्रबंधकों और कंपनी सचिव को दी गई राहत को रद्द किया जाए और उनके खिलाफ भी जिम्मेदारी बहाल की जाए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला सहारा OFCD विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ साबित हो सकता है।