छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बर्खास्तगी रद्द होने के बाद प्रोफेसर को मिलेगा 50% बकाया वेतन

JUSTICE N. K. CHANDRAVANSHI, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रोहित सेठ को बड़ी राहत देते हुए उन्हें सेवा से बाहर रहने की अवधि का 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि उनकी सेवा समाप्ति को राष्ट्रपति, विश्वविद्यालय के विजिटर के रूप में, रद्द कर चुके थे और उन्हें पिछली तारीख से सेवा में बहाल किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने पूरी अवधि का 100 प्रतिशत बकाया वेतन देने के बजाय परिस्थितियों को देखते हुए 50 प्रतिशत भुगतान का आदेश दिया है।

यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने WPS No. 8387 of 2023, डॉ. रोहित सेठ बनाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय एवं अन्य, में 14 अगस्त 2026 को सुनाया। मामले का संदर्भ 2026:CGHC:36128 है। आदेश 17 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

2013 में हुई थी सेवा समाप्ति

मामले के अनुसार डॉ. रोहित सेठ की नियुक्ति 29 सितंबर 2011 को गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हुई थी। वे उस समय परिवीक्षा अवधि में थे। विश्वविद्यालय ने उन पर दायित्वों और कर्तव्यों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए 20 फरवरी 2013 को उनकी सेवा समाप्त कर दी थी।

सेवा समाप्ति के खिलाफ डॉ. सेठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में WPS No. 831 of 2013 दायर की थी। इस याचिका के लंबित रहने के दौरान विश्वविद्यालय के विजिटर और भारत के राष्ट्रपति ने 12 अप्रैल 2017 के आदेश से उनकी सेवा समाप्ति को निरस्त कर दिया। इसके बाद 27 अप्रैल 2017 को उन्हें इसकी सूचना दी गई और उनकी सेवा 20 फरवरी 2013 से पूर्व प्रभाव से बहाल मानी गई।

डॉ. सेठ ने 14 जून 2017 को दोबारा अपनी सेवा ज्वाइन की।

बहाली के बावजूद नहीं मिला बकाया वेतन

सेवा में पूर्व प्रभाव से बहाली के बावजूद विश्वविद्यालय ने 20 फरवरी 2013 से 27 अप्रैल 2017 की अवधि के सेवा लाभ और बकाया वेतन का भुगतान नहीं किया। डॉ. सेठ ने इस संबंध में विश्वविद्यालय के समक्ष कई बार अभ्यावेदन दिए।

इसके बाद उन्होंने WPS No. 3649 of 2020 के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने 17 सितंबर 2020 को विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह उनके सेवा लाभ के दावे पर दो महीने के भीतर निर्णय ले।

निर्देश के बावजूद विवाद का समाधान नहीं होने पर डॉ. सेठ ने Contempt Case No. 753 of 2023 दायर किया। इसी दौरान विश्वविद्यालय ने बताया कि उसने 16 सितंबर 2023 को उनके दावे पर निर्णय लेते हुए बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया है। इसके बाद अवमानना याचिका 19 सितंबर 2023 को समाप्त कर दी गई। विश्वविद्यालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए वर्तमान याचिका दायर की गई।

“नो वर्क, नो पे” के आधार पर भुगतान से इनकार

विश्वविद्यालय की ओर से दलील दी गई कि डॉ. सेठ ने अपनी पहले की याचिकाओं में बकाया वेतन की मांग नहीं की थी। इसलिए इतने समय बाद इस दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि विजिटर के 12 अप्रैल 2017 के आदेश में बकाया वेतन देने का निर्देश नहीं था। विश्वविद्यालय के अनुसार, यदि डॉ. सेठ बकाया वेतन चाहते थे तो उन्हें यह साबित करना चाहिए था कि सेवा समाप्ति की अवधि के दौरान वे कहीं और लाभकारी रोजगार में नहीं थे।

विश्वविद्यालय ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें Management of Regional Chief Engineer, Public Health and Engineering Department, Ranchi v. Their Workmen, Rajasthan State Road Transport Corporation v. Phool Chand और Senior Superintendent Telegraph (Traffic), Bhopal v. Santosh Kumar Seal शामिल थे। इन फैसलों के आधार पर तर्क दिया गया कि अवैध सेवा समाप्ति के बाद बहाली होने मात्र से बकाया वेतन स्वतः नहीं मिलता।

हाईकोर्ट ने माना, सेवा समाप्ति कानूनन टिकाऊ नहीं थी

हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. सेठ की 20 फरवरी 2013 की सेवा समाप्ति को विजिटर द्वारा रद्द कर दिया गया था और उन्हें पूर्व प्रभाव से सेवा में बहाल किया गया था। इसका अर्थ है कि सेवा समाप्ति कानूनन टिकाऊ नहीं रही।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में कर्मचारी को सेवा की निरंतरता का लाभ मिलना चाहिए। इसमें वरिष्ठता, वेतन वृद्धि, अवकाश, पेंशन संबंधी लाभ और अन्य परिणामी सेवा लाभ शामिल हैं।

कोर्ट ने कहा, “बकाया वेतन का दावा अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता, बल्कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर इसे प्रदान किया जा सकता है।”

इस तरह कोर्ट ने “No Work, No Pay” के सिद्धांत को इस मामले में पूरी तरह यांत्रिक तरीके से लागू करने से इनकार किया। कोर्ट के अनुसार, जब कर्मचारी को उसकी सेवा समाप्ति के कारण काम करने से रोका गया हो और बाद में वही सेवा समाप्ति रद्द कर दी गई हो, तो बकाया वेतन के दावे पर मामले की पूरी परिस्थितियों को देखना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के Deepali Gundu Surwase फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Deepali Gundu Surwase v. Kranti Junior Adhyapak Mahavidyalaya (D.Ed.) and Others, (2013) 10 SCC 324 पर भी विचार किया।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने wrongful termination के मामलों में बहाली, सेवा की निरंतरता और बकाया वेतन से संबंधित सिद्धांत स्पष्ट किए थे। सामान्य तौर पर गलत तरीके से सेवा समाप्त किए गए कर्मचारी को बहाली के साथ बकाया वेतन मिल सकता है, लेकिन बकाया वेतन की मात्रा तय करते समय सेवा की अवधि, कर्मचारी का आचरण, कथित कदाचार, नियोक्ता की वित्तीय स्थिति और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कर्मचारी यह कहता है कि सेवा समाप्ति के बाद वह कहीं और लाभकारी रोजगार में नहीं था, तो नियोक्ता को उस दावे का विरोध करने के लिए उसके लाभकारी रोजगार में होने का तथ्य और उसका प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ सकता है।

फिर भी 100% बकाया वेतन क्यों नहीं मिला?

हाईकोर्ट ने पाया कि डॉ. सेठ ने याचिका में कहा था कि सेवा समाप्ति की अवधि के दौरान वे कहीं और लाभकारी रोजगार में नहीं थे। उन्होंने इस संबंध में सत्यापित शपथपत्र भी दिया था। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि डॉ. सेठ उस अवधि में कहीं और लाभकारी रोजगार में थे।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि डॉ. सेठ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उस अवधि में उनके जीवन-यापन और परिवार के भरण-पोषण का स्रोत क्या था। कोर्ट ने इसी कमी को देखते हुए पूरे 100 प्रतिशत बकाया वेतन के बजाय 50 प्रतिशत बकाया वेतन देना न्यायसंगत माना।

कोर्ट ने कहा कि मामले में दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए 50 प्रतिशत बकाया वेतन देना न्याय के उद्देश्य को पूरा करेगा।

60 दिन में करना होगा भुगतान, देरी पर 9% ब्याज

हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के 16 सितंबर 2023 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डॉ. सेठ के बकाया वेतन के दावे को खारिज किया गया था।

कोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह 20 फरवरी 2013 से 14 जून 2017 तक की अवधि का 50 प्रतिशत बकाया वेतन डॉ. सेठ को दे। यह भुगतान आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर किया जाना है।

यदि विश्वविद्यालय 60 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता है तो निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद वास्तविक भुगतान तक बकाया राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। कोर्ट ने मामले में कोई हर्जाना या मुकदमे की लागत देने का आदेश नहीं दिया।

फैसले का सेवा कानून पर महत्व

यह फैसला सेवा कानून के उस महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि अवैध या अस्थिर सेवा समाप्ति के बाद कर्मचारी की बहाली और बकाया वेतन दो अलग-अलग प्रश्न हैं। बहाली और सेवा की निरंतरता मिलने का अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में 100 प्रतिशत बकाया वेतन स्वतः मिल जाएगा।

दूसरी ओर, यदि कर्मचारी को उसकी सेवा समाप्ति के कारण काम करने से रोका गया और बाद में सेवा समाप्ति रद्द कर दी गई, तो “No Work, No Pay” का सिद्धांत अकेले बकाया वेतन से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत तथ्यों, कर्मचारी के दावे, उपलब्ध साक्ष्य और दोनों पक्षों के आचरण को देखकर उचित राहत तय कर सकती है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने डॉ. सेठ को सेवा की निरंतरता से जुड़े लाभों के साथ 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश देकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। विश्वविद्यालय कर्मचारियों के लिए यह फैसला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि गलत तरीके से की गई सेवा समाप्ति बाद में रद्द होने पर उसके सेवा संबंधी व्यापक प्रभाव हो सकते हैं।

मामले में संवैधानिक आधार भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट की रिट अधिकारिता था। यह मामला सेवा कानून से संबंधित है और इसमें किसी आपराधिक अपराध के संबंध में IPC, BNS, CrPC या BNSS की धाराएं लागू होने का उल्लेख आदेश में नहीं है।

मामला: Dr. Rohit Seth v. Guru Ghasidas Vishwavidyalaya & Others
याचिका: WPS No. 8387 of 2023
केस रेफरेंस: 2026:CGHC:36128
अदालत: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर
निर्णय: 14 अगस्त 2026
न्यायाधीश: न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी
राहत: 20 फरवरी 2013 से 14 जून 2017 तक 50% बकाया वेतन, 60 दिन में भुगतान; देरी पर 9% वार्षिक ब्याज।