भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि भारत अब केवल अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक विवादों का केंद्र नहीं है, बल्कि निष्पक्ष, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से ऐसे विवादों का समाधान करने वाले वैश्विक न्यायिक क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन) के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन विधायी सुधारों, न्यायपालिका की प्रगतिशील व्याख्याओं, संस्थागत सुदृढ़ीकरण तथा मध्यस्थता (Arbitration) और सुलह (Mediation) व्यवस्था के निरंतर विकास का परिणाम है।
मुख्य न्यायाधीश शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग (UNCITRAL) की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन का संयुक्त आयोजन भारत के सर्वोच्च न्यायालय, विदेश मंत्रालय और यूएनसीट्राल द्वारा किया गया।
सीजेआई ने कहा कि भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों के दौरान व्यापक सुधार हुए हैं। विशेष मध्यस्थता संस्थानों की स्थापना, कानूनों में संशोधन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने भारत को वैश्विक निवेशकों और कारोबारी संस्थाओं के लिए भरोसेमंद विवाद समाधान केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
उन्होंने कहा कि भारत की व्यापारिक परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। गुजरात के लोथल में सिंधु घाटी सभ्यता द्वारा निर्मित प्राचीन बंदरगाह और मेसोपोटामिया में मिले भारतीय व्यापारिक अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि भारत आधुनिक व्यापारिक कानूनों और संधियों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार करता था। उस समय भी व्यापार का आधार विश्वास, निश्चितता और समझौतों के पालन की भावना थी, जो आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था की मूल आधारशिला है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1966 में यूएनसीट्राल की स्थापना ऐसे समय में की थी, जब वैश्विक व्यापार तेजी से बढ़ रहा था लेकिन विभिन्न देशों के अलग-अलग कानूनों के कारण कानूनी अनिश्चितता बनी हुई थी। यूएनसीट्राल ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानूनों में सामंजस्य स्थापित करने का कार्य किया और पिछले छह दशकों में अंतरराष्ट्रीय बिक्री, वाणिज्यिक मध्यस्थता, सुलह, इलेक्ट्रॉनिक व्यापार, दिवालियापन, सुरक्षित लेनदेन और डिजिटल व्यापार जैसे क्षेत्रों में वैश्विक कानूनी ढांचे को मजबूत किया।
उन्होंने भारत की ओर से यूएनसीट्राल के साथ किए जा रहे सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि भारत की राष्ट्रीय समन्वय समिति (National Coordination Committee) ने कार्य समूहों में सक्रिय भागीदारी, परामर्श और कानूनी योगदान के माध्यम से भारतीय न्यायशास्त्र को वैश्विक व्यापार कानून के विकास में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।
सीजेआई ने न्यायपालिका में हुए तकनीकी सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG), संविधान पीठ की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग, रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन तथा प्रस्तावित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) नियामक ढांचा न्यायिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुलभ और भरोसेमंद बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और मेडिएशन एंड कंसिलिएशन प्रोजेक्ट कमेटी (MCPC) के सहयोग से “मेडिएशन फॉर द नेशन” अभियान और विशेष लोक अदालत जैसी पहलें विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा दे रही हैं। साथ ही, मध्यस्थता अधिनियम, 2023 ने पहली बार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए व्यापक वैधानिक ढांचा उपलब्ध कराया है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आधुनिक वैश्विक व्यापार व्यवस्था में मध्यस्थता और सुलह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पारंपरिक न्यायालयी मुकदमेबाजी अक्सर क्षेत्राधिकार और प्रक्रियात्मक जटिलताओं से प्रभावित होती है, जबकि मध्यस्थता और सुलह पक्षकारों को निष्पक्ष मंच, विशेषज्ञता, लचीली प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू होने योग्य समाधान प्रदान करती हैं। इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ता है और व्यापारिक संबंध भी सुरक्षित रहते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायालय मध्यस्थता और सुलह के प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, बल्कि उनके संवैधानिक और कानूनी आधार हैं। न्यायालय पक्षकारों की स्वायत्तता की रक्षा करते हैं, निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करते हैं तथा मध्यस्थता निर्णयों और समझौतों को लागू कराते हैं। न्यायालय केवल वहीं हस्तक्षेप करते हैं, जहां विधि के शासन की रक्षा आवश्यक हो।
सीजेआई ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी भारतीय चिकित्सा उपकरण निर्माता और दक्षिण-पूर्व एशिया के वितरक के बीच वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के कारण विवाद उत्पन्न हो जाए, तो मध्यस्थता अनुबंध संबंधी अधिकारों और दायित्वों का निर्धारण कर सकती है, जबकि सुलह दोनों पक्षों को नई डिलीवरी समय-सीमा, मूल्य निर्धारण और व्यावसायिक संबंध बनाए रखने का अवसर प्रदान कर सकती है।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल व्यापार, सीमा-पार दिवालियापन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रही हैं। तीन दिवसीय सम्मेलन में इन सभी विषयों पर विस्तृत चर्चा होगी। हालांकि समय के साथ परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन वाणिज्यिक न्याय के मूल सिद्धांत विश्वास, निष्पक्षता, कानूनी निश्चितता और विधि का शासन सदैव अपरिवर्तित रहेंगे।
सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। उन्होंने कहा कि विश्व के देश अब ऐसे कानूनी ढांचे की अपेक्षा कर रहे हैं, जो सीमा-पार व्यापार और निवेश में अधिक निश्चितता तथा प्रभावी विवाद समाधान सुनिश्चित कर सके।
केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि भारत में न्यायिक सुधारों का केंद्र विधायी आधुनिकीकरण, संस्थागत सुदृढ़ीकरण और डिजिटल परिवर्तन रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने मध्यस्थता और सुलह तंत्र को मजबूत करने, न्यायिक दक्षता बढ़ाने तथा कारोबार सुगमता को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुधार लागू किए हैं, जिससे भारत निवेशकों के लिए अधिक भरोसेमंद और अनुकूल वातावरण प्रदान कर रहा है।
