दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले की सुनवाई पर लगाई रोक, वैवाहिक विवादों में गंभीर यौन आरोपों के बढ़ते चलन पर जताई चिंता

Delhi High Court

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म, क्रूरता और अन्य गंभीर धाराओं से जुड़े एक आपराधिक मामले में दो आरोपियों के विरुद्ध चल रही ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में समझौते के लिए ससुराल पक्ष पर आर्थिक दबाव बनाने की नीयत से दुष्कर्म और अन्य यौन अपराधों के आरोप लगाने का एक चिंताजनक रुझान सामने आ रहा है।

न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया की एकलपीठ एफआईआर संख्या 239/2024 को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह एफआईआर संगम विहार थाना में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 498ए, 406, 376, 354ए, 506, 509 और 34 के तहत दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ता विक्रम कुमार झा उर्फ आर्यन आद्विक और एक अन्य ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता उनकी अलग रह रही भाभी हैं और उनके विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामला प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराया गया है। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता के पति द्वारा तलाक की याचिका दायर किए जाने के बाद यह मामला दर्ज कराया गया।

याचिका के अनुसार शिकायतकर्ता का विवाह 8 जुलाई 2016 को हुआ था और दंपति के दो बच्चे हैं। पति ने 18 सितंबर 2023 को तलाक की याचिका दायर की, जबकि शिकायतकर्ता ने 15 अप्रैल 2024 को एफआईआर दर्ज कराई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि मूल एफआईआर में दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक क्रूरता के आरोप तो थे, लेकिन देवरों के विरुद्ध दुष्कर्म का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। उन्होंने कहा कि दुष्कर्म का आरोप पहली बार 15 जून 2024 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में लगाया गया, जिसमें वर्ष 2017 की कथित घटना का उल्लेख किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि लगभग सात वर्ष बाद इतने गंभीर आरोप लगाए जाने के पीछे कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया है। उनके अनुसार यह मामला दुर्भावनापूर्ण तरीके से दर्ज कराया गया है और इसका उद्देश्य वैवाहिक विवाद में दबाव बनाना है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों में विचारणीय आधार है। अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) फैसले के बाद, जिसमें धारा 498ए और 406 के मामलों में स्वतः गिरफ्तारी पर रोक संबंधी दिशा-निर्देश दिए गए थे, कुछ मामलों में यह प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि समझौते के लिए दबाव बनाने की नीयत से ससुराल पक्ष के सदस्यों पर दुष्कर्म, छेड़छाड़ और अन्य यौन अपराधों के आरोप लगाए जाते हैं। हालांकि यह टिप्पणी मामले के अंतिम निर्णय के रूप में नहीं है और प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों के आधार पर किया जाएगा।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। अदालत ने शिकायतकर्ता को जांच अधिकारी के माध्यम से नोटिस जारी किया तथा राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक को स्थिति रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले दाखिल करने का निर्देश दिया।

मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।