केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने स्टोरिया के ‘100% नारियल पानी’ और ‘100% जूस’ दावों को बताया भ्रामक, उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन का मामला पाया

Central Consumer Protection Authority India - CCPA

नई दिल्ली – केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने स्टोरिया फूड्स एंड बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए उसके कुछ पेय उत्पादों पर किए गए “100% टेंडर कोकोनट वॉटर”, “100% नेचुरल टेंडर कोकोनट वॉटर” और “100% जूस” जैसे दावों को प्रथम दृष्टया भ्रामक माना है। प्राधिकरण ने कहा कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को उत्पाद की वास्तविक प्रकृति, संरचना और गुणवत्ता के बारे में गलत धारणा दे सकते हैं।

सीसीपीए ने यह मामला स्वतः संज्ञान लेते हुए शुरू किया था। जांच में पाया गया कि स्टोरिया अपने नारियल पानी और विभिन्न फलों के जूस उत्पादों का प्रचार अपनी वेबसाइट, पैकेजिंग और प्रमुख ई-कॉमर्स मंचों पर “100%” दावों के साथ कर रही थी। हालांकि उत्पादों के घटक विवरण से पता चला कि नारियल पानी के उत्पादों में पानी और नारियल पानी के सांद्रण (कंसंट्रेट) का उपयोग किया गया था, जिसे बाद में पुनर्गठित किया गया था। इसी प्रकार “100% जूस” के रूप में प्रचारित कुछ उत्पादों में पानी, सेब के रस का सांद्रण और अन्य फलों के घटक विभिन्न अनुपातों में मौजूद थे।

प्राधिकरण ने यह भी पाया कि कंपनी अपने नारियल पानी उत्पादों के साथ “वायरस से लड़ता है”, “मेटाबॉलिज्म बेहतर करता है”, “थकान दूर करता है” और “पानी से तेज शरीर को पुनर्जलीकरण करता है” जैसे स्वास्थ्य संबंधी दावे कर रही थी। सीसीपीए के अनुसार इन दावों के समर्थन में उत्पाद-विशिष्ट वैज्ञानिक प्रमाण या नैदानिक अध्ययन रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थे।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28), 2(47), 10, 18 और 21 के तहत कार्रवाई करते हुए प्राधिकरण ने कहा कि उपभोक्ताओं को उत्पादों की वास्तविक गुणवत्ता, मात्रा, संरचना और प्रकृति के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। यदि किसी विज्ञापन या पैकेजिंग से उत्पाद के बारे में गलत या बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की गई छवि बनती है, तो उसे भ्रामक विज्ञापन और अनुचित व्यापार व्यवहार माना जा सकता है।

कंपनी ने अपने बचाव में तर्क दिया कि उसके उत्पाद खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के नियमों के अनुरूप बनाए गए हैं और सांद्रण से पुनर्गठित उत्पादों के निर्माण की प्रक्रिया वैध है। कंपनी ने यह भी कहा कि कुछ विवादित दावों को पहले ही हटा दिया गया है और लेबलिंग में आवश्यक खुलासे किए गए हैं।

हालांकि सीसीपीए ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होता है और केवल खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन कर लेने से किसी कंपनी को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जांच से छूट नहीं मिल सकती। आदेश में कहा गया कि वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या विज्ञापन और पैकेजिंग एक सामान्य उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में गलत धारणा बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

सीसीपीए ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “एक सामान्य उपभोक्ता ‘100% टेंडर कोकोनट वॉटर’ या ‘100% नेचुरल टेंडर कोकोनट वॉटर’ शब्दों को देखकर यह समझेगा कि उत्पाद पूरी तरह प्राकृतिक नारियल पानी है, जिसमें किसी प्रकार की सांद्रण, पुनर्गठन या संरक्षक की प्रक्रिया शामिल नहीं है।” प्राधिकरण ने माना कि “100%” और “नेचुरल” जैसे शब्द उत्पाद की वास्तविक संरचना के बारे में भ्रामक प्रभाव पैदा करते हैं।

प्राधिकरण ने यह भी कहा कि पैकेज के पीछे छोटे अक्षरों में दिए गए स्पष्टीकरण मुख्य दावे की भ्रामक प्रकृति को समाप्त नहीं कर सकते। 2022 के भ्रामक विज्ञापन रोकथाम दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए सीसीपीए ने कहा कि कोई भी अस्वीकरण या डिस्क्लेमर ऐसे मुख्य दावे को सही नहीं ठहरा सकता जो स्वयं में भ्रामक हो।

जांच रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि कंपनी ने अपने उत्पादों के स्वास्थ्य लाभ संबंधी दावों के समर्थन में स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत नहीं किए और मुख्य रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध सामग्री पर निर्भर रही। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे दावे उपभोक्ताओं को उत्पाद की वास्तविक क्षमता और गुणवत्ता के बारे में भ्रमित कर सकते हैं।

यह आदेश खाद्य और पेय उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियां केवल तकनीकी अनुपालन का हवाला देकर उपभोक्ताओं को प्रभावित करने वाले दावों से बच नहीं सकतीं। यदि किसी उत्पाद की पैकेजिंग, विज्ञापन या ऑनलाइन प्रस्तुति उपभोक्ताओं को उसकी वास्तविक प्रकृति के बारे में भ्रमित करती है, तो उस पर उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का असर उन सभी कंपनियों पर पड़ सकता है जो अपने उत्पादों के प्रचार में “100%”, “शुद्ध”, “प्राकृतिक” या इसी प्रकार के पूर्ण दावों का उपयोग करती हैं। यह आदेश उपभोक्ताओं के सूचना के अधिकार को मजबूत करने और विज्ञापनों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।