सीईस्टैट से रोचीज़ टाइम प्राइवेट लिमिटेड को बड़ी राहत, ₹13,401 को छोड़ अधिकांश सीमा शुल्क मांग और सभी प्रमुख दंड रद्द

Central Excise and Service Tax Appellate Tribunal - CESTAT

सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (सीईस्टैट), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने जयपुर स्थित रोचीज़ टाइम प्राइवेट लिमिटेड को करीब 15 वर्ष पुराने सीमा शुल्क विवाद में बड़ी राहत देते हुए अधिकांश सीमा शुल्क मांग, जब्ती, रिडेम्प्शन फाइन और दंड को निरस्त कर दिया है। न्यायाधिकरण ने केवल ₹13,401 की सीमा शुल्क मांग और उस पर देय ब्याज को बरकरार रखा, जबकि कंपनी के विरुद्ध लगाए गए शेष दावे और दो व्यक्तियों पर लगाए गए व्यक्तिगत दंड भी समाप्त कर दिए।

यह मामला वर्ष 2007 में राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस से जुड़ा था। इसके आधार पर सीमा शुल्क आयुक्त, जयपुर ने 31 दिसंबर 2010 को आदेश पारित करते हुए कंपनी द्वारा आयात किए गए घड़ी के पुर्जों और वॉच मूवमेंट्स के घोषित मूल्य को अस्वीकार कर दिया था। विभाग ने लगभग ₹20.67 लाख के अंतरित सीमा शुल्क, ब्याज, माल की जब्ती, रिडेम्प्शन फाइन तथा सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 28(1), 111, 112, 114A और 125 के तहत कार्रवाई की थी। इसके अलावा ओम प्रकाश पारीक और नीरज मूलराजानी पर भी व्यक्तिगत दंड लगाया गया था।

डीआरआई का आरोप था कि रोचीज़ टाइम और उससे संबंधित अन्य कंपनियां हांगकांग स्थित संबद्ध संस्थाओं से घड़ी के पुर्जों का आयात करती थीं और वास्तविक मूल्य छिपाकर कम कीमत घोषित करती थीं, जिससे सीमा शुल्क की चोरी होती थी। जांच के दौरान विभाग ने जब्त दस्तावेजों, चालानों और विभिन्न व्यक्तियों के बयानों के आधार पर दावा किया कि कई मामलों में आयातित सामान का मूल्य वास्तविक कीमत से काफी कम दर्शाया गया था।

अपीलकर्ताओं ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि विभाग मूल्य कम घोषित किए जाने का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहा। उनका यह भी तर्क था कि जिन बयानों पर विभाग ने भरोसा किया, उनके संबंध में जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) का अवसर नहीं दिया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। साथ ही, तीसरे पक्ष के दस्तावेजों के आधार पर मूल्य निर्धारण करना भी कानून के अनुरूप नहीं था।

मामले की सुनवाई के दौरान सीईस्टैट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि भले ही घोषित लेन-देन मूल्य को कस्टम्स वैल्यूएशन नियम, 1988 के नियम 10ए के तहत अस्वीकार किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद नए मूल्य का निर्धारण नियमों में निर्धारित क्रम के अनुसार ही किया जाना आवश्यक है। न्यायाधिकरण ने पाया कि आयुक्त के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस आयातित वस्तु के लिए कौन-सा मूल्यांकन नियम अपनाया गया और उसका कानूनी आधार क्या था।

पीठ ने कहा कि “कस्टम्स वैल्यूएशन नियमों में एक साथ कई नियमों के आधार पर मूल्य निर्धारण का कोई प्रावधान नहीं है।” न्यायाधिकरण के अनुसार विभाग ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना पुनर्मूल्यांकन किया, इसलिए अधिकांश वस्तुओं के संबंध में नया मूल्य निर्धारण टिक नहीं सकता।

हालांकि न्यायाधिकरण ने लेदर स्ट्रैप्स से संबंधित ₹13,401 की सीमा शुल्क मांग को सही माना, लेकिन इसके अतिरिक्त किए गए पुनर्मूल्यांकन, जब्ती, रिडेम्प्शन फाइन और दंड को कानूनी रूप से अस्थिर पाया। इसके परिणामस्वरूप कंपनी के विरुद्ध लगाया गया अधिकांश वित्तीय दायित्व समाप्त कर दिया गया। साथ ही ओम प्रकाश पारीक और नीरज मूलराजानी के विरुद्ध लगाए गए व्यक्तिगत दंड भी पूरी तरह रद्द कर दिए गए।

यह निर्णय सीमा शुल्क मूल्यांकन से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि केवल कम मूल्य घोषित करने का संदेह पर्याप्त नहीं है। यदि विभाग घोषित लेन-देन मूल्य को अस्वीकार करता है तो उसे सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 14 तथा कस्टम्स वैल्यूएशन नियमों के अनुसार क्रमबद्ध और कारणयुक्त तरीके से नया मूल्य निर्धारित करना होगा। वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना अतिरिक्त सीमा शुल्क, जब्ती या दंड नहीं लगाया जा सकता।