सिक्किम हाई कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म और आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी की सजा बरकरार रखी, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर राज्य को दिए अहम निर्देश

The Rajpatra Law

सिक्किम हाई कोर्ट ने 16 वर्षीय छात्रा से यौन उत्पीड़न और उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने के मामले में दोषी 42 वर्षीय व्यक्ति चेवांग शेरपा की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने ऐसे ठोस और निर्विवाद साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, जो आरोपी के अपराध को संदेह से परे सिद्ध करते हैं। न्यायालय ने माना कि आरोपी के कृत्यों ने पीड़िता को इस हद तक मानसिक रूप से तोड़ दिया कि उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।

मुख्य न्यायाधीश ए. मुहम्मद मुस्ताके और न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान की खंडपीठ ने शुक्रवार को वर्ष 2023 के दोषसिद्धि आदेश के विरुद्ध दायर अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी तरह से जुड़ी हुई है और इससे आरोपी के निर्दोष होने की कोई संभावना नहीं बचती।

मामला 20 अगस्त 2021 का है, जब कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कक्षा 12वीं की छात्रा परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जमा करने स्कूल गई थी। लौटते समय उसने अपने ही गांव के रहने वाले आरोपी से वाहन में लिफ्ट ली। रास्ते में भारी बारिश होने पर दोनों एक मठ के पास रुके, जहां अभियोजन के अनुसार आरोपी ने छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न किया।

घर लौटने के बाद छात्रा ने अपनी स्कूल की कॉपी में पूरी घटना का विस्तार से उल्लेख किया और बाद में आत्महत्या कर ली। आरोपी ने जांच और कथित सुसाइड नोट की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए थे, लेकिन हाई कोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पीड़िता द्वारा लिखी गई नोट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत वैध मृत्यु पूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) है।

खंडपीठ ने कहा कि पीड़िता ने आरोपी के कृत्य को इतना अपमानजनक, घृणित और असहनीय माना कि वह स्वयं को गहरे मानसिक आघात और अपमान की स्थिति से बाहर नहीं निकाल सकी तथा किसी का सामना करने का साहस भी खो बैठी। यही परिस्थितियां उसे आत्महत्या करने के लिए विवश कर गईं।

हालांकि हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में आंशिक संशोधन किया। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए के तहत यौन उत्पीड़न के लिए दी गई पृथक तीन वर्ष की सजा को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 42 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 71 के अनुसार यदि एक ही कृत्य पर विभिन्न कानून लागू होते हैं, तो केवल अधिक कठोर दंड ही प्रभावी रहेगा। इसी आधार पर अदालत ने शेष सभी सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया।

निर्णय में हाई कोर्ट ने राज्य की जेल सुधार व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने उल्लेख किया कि आरोपी इससे पहले भी भारतीय दंड संहिता की धारा 458 के तहत दोषी ठहराया जा चुका था, लेकिन रोंगयेक स्थित राज्य केंद्रीय कारागार में उसके पुनर्वास की प्रक्रिया प्रभावी साबित नहीं हुई। न्यायालय ने कहा कि पूर्व सजा के बावजूद आरोपी ने इससे भी अधिक गंभीर अपराध किया, जिससे जेलों में सुधारात्मक व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।

अदालत ने अपने फैसले में बच्चों, विशेषकर मानसिक आघात झेल रही किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर राज्य सरकार को विशेष कदम उठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पीड़िता के सुसाइड नोट का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि उसमें व्यक्त मानसिक पीड़ा अत्यंत चिंताजनक है और बच्चों के लिए वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने, ठोस कार्ययोजना तैयार करने तथा वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि स्वस्थ मानसिक स्थिति वाले बच्चे ही राज्य और देश के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला हैं।