लखनऊ: उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण (UP Real Estate Appellate Tribunal) ने व्यावसायिक अचल संपत्ति से जुड़े विवादों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि कार्यालय (ऑफिस) परिसर के आवंटन और ‘अश्योर्ड रिटर्न’ से जुड़े दावे रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (RERA) के तहत विचारणीय नहीं हैं। न्यायाधिकरण ने एम/एस डियोग्राजिया रियलकॉन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा भूटानी ग्रुप के खिलाफ दायर 11 अपीलों को खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश रेरा प्राधिकरण (UP RERA) के 12 अगस्त 2024 के आदेशों को अधिकार क्षेत्र के अभाव में निरस्त कर दिया। साथ ही मूल शिकायतों को भी रेरा कानून के तहत गैर-विचारणीय घोषित कर खारिज कर दिया।
न्यायिक सदस्य संजय खरे और तकनीकी सदस्य देविंदर सिंह चौधरी की पीठ ने अपील संख्या 382 से 392 वर्ष 2024 पर एक साझा निर्णय सुनाया। ये अपीलें रेरा अधिनियम की धारा 44 के तहत दायर की गई थीं और गौतमबुद्ध नगर स्थित उत्तर प्रदेश रेरा प्राधिकरण द्वारा पारित दो संयुक्त आदेशों को चुनौती दी गई थी।
क्या था पूरा विवाद?
मामला नोएडा के सेक्टर-90 स्थित भूटानी ग्रुप की व्यावसायिक परियोजना “अल्फाथम” में खरीदे गए कार्यालय परिसरों से जुड़ा था। अपीलकर्ता कंपनी का कहना था कि वर्ष 2017-18 में कई कार्यालय इकाइयां खरीदी गई थीं, जिनमें निश्चित अवधि के भीतर कब्जा देने और ‘अश्योर्ड रिटर्न’ देने का वादा किया गया था। कंपनी का आरोप था कि निर्धारित समय तक वैध कब्जा नहीं दिया गया, जबकि परियोजना के लिए आवश्यक ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) और कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) भी उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद अंतिम भुगतान की मांग की गई और विलंब से भुगतान पर 18 प्रतिशत तक ब्याज लगाने की चेतावनी दी गई।
अपीलकर्ता ने यह भी दावा किया कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला कि नोएडा प्राधिकरण द्वारा परियोजना पर उठाई गई आपत्तियां अभी तक दूर नहीं की गई थीं। इसलिए बिना वैध OC/CC के कब्जा देने की पेशकश कानून के अनुरूप नहीं थी। कंपनी ने न्यायाधिकरण से वैध प्रमाणपत्र प्राप्त होने के बाद कब्जा, 18 प्रतिशत वार्षिक विलंब ब्याज, अनुबंध के अनुसार अश्योर्ड रिटर्न तथा मानसिक उत्पीड़न के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा दिलाने की मांग की थी।
भूटानी ग्रुप का पक्ष
भूटानी ग्रुप ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि परियोजना का निर्माण पूरा हो चुका था और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष ऑक्यूपेंसी तथा कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया जा चुका था। कंपनी का तर्क था कि उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 के अनुसार यदि निर्धारित समय के भीतर आवेदन पर कोई आपत्ति या अस्वीकृति नहीं आती, तो उसे “डीम्ड कम्प्लीशन” माना जा सकता है। कंपनी ने यह भी कहा कि आवश्यक एनओसी पहले ही प्राप्त कर ली गई थीं और नोएडा प्राधिकरण की ओर से कोई आपत्ति नहीं भेजी गई थी।
न्यायाधिकरण ने क्या कहा?
न्यायाधिकरण ने विवाद के गुण-दोष पर विस्तार से विचार करने के बजाय पहले यह तय किया कि क्या ऐसी शिकायतें रेरा के तहत सुनवाई योग्य हैं। पीठ ने कहा कि किसी भी मामले में सबसे पहले उसकी विचारणीयता (Maintainability) और अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) की जांच की जानी चाहिए। यदि प्राधिकरण के पास अधिकार ही नहीं है, तो वह मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं दे सकता।
न्यायाधिकरण ने स्पष्ट कहा कि रेरा प्राधिकरण ने पहले यह नहीं देखा कि शिकायतें उसके अधिकार क्षेत्र में आती भी हैं या नहीं। आदेश में कहा गया कि “प्राधिकरण ने ऐसा अधिकार प्रयोग किया जो उसे कानून के तहत प्राप्त नहीं था।”
पीठ ने यह भी कहा कि इस मामले में कार्यालय परिसर, अनलॉकबल स्पेस और वर्चुअल स्पेस का आवंटन रेरा अधिनियम के दायरे में नहीं आता। इसी प्रकार अनुबंध के आधार पर अश्योर्ड रिटर्न की मांग भी रेरा प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इसलिए प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश अधिकार क्षेत्र के अभाव में अस्थिर हैं।
11 शिकायतें और रेरा के आदेश निरस्त
न्यायाधिकरण ने सभी 11 अपीलों को गैर-विचारणीय मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही 12 अगस्त 2024 को उत्तर प्रदेश रेरा द्वारा पारित सभी आदेशों को निरस्त कर दिया तथा संबंधित 11 शिकायतों को भी रेरा अधिनियम के तहत विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि न्यायाधिकरण ने यह स्पष्ट किया कि शिकायतों की अस्वीकृति से अपीलकर्ताओं का अन्य सक्षम न्यायिक या वैधानिक मंच पर जाने का अधिकार समाप्त नहीं होगा। वे कानून के अनुसार उपयुक्त मंच पर अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं।
फैसले का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय व्यावसायिक रियल एस्टेट क्षेत्र, विशेषकर कार्यालय परिसरों में निवेश करने वाले खरीदारों और डेवलपर्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्रत्येक व्यावसायिक संपत्ति विवाद स्वतः रेरा के अधिकार क्षेत्र में नहीं आएगा। विशेष रूप से अश्योर्ड रिटर्न, निवेश आधारित अनुबंध या अन्य व्यावसायिक दावों के लिए पक्षकारों को परिस्थितियों के अनुसार सिविल न्यायालय, मध्यस्थता (Arbitration), उपभोक्ता आयोग या अन्य सक्षम मंच का सहारा लेना पड़ सकता है।
