सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या किशोरों के सहमति वाले हर रिश्ते पर पॉक्सो कानून लागू होना चाहिए?

Supreme Court of India

किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों में पॉक्सो कानून के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। सोमवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि कई मामलों में माता-पिता अपनी “इज्जत” बचाने के लिए किशोर-किशोरियों के घर से भाग जाने पर पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत आपराधिक मामले दर्ज करा देते हैं, जबकि बाद में अदालतों को ऐसे मामलों में आरोपियों को बरी करना पड़ता है।

यह टिप्पणी उस स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसे कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक विवादित फैसले के बाद शुरू किया गया था। उस फैसले में किशोरियों को अपनी “यौन इच्छाओं पर नियंत्रण” रखने की सलाह दी गई थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की आयु किशोरों के भावनात्मक और मानसिक विकास का महत्वपूर्ण दौर होता है। ऐसे में यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या इस आयु वर्ग के हर सहमति आधारित संबंध को पॉक्सो कानून के तहत अपराध माना जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो अधिनियम का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और यौन अपराधों से संरक्षण देना है, इसलिए यह भी देखना जरूरी है कि क्या हर मामला वास्तव में इस कानून के दायरे में आता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि जिस मामले के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया गया था, उसमें एक नाबालिग लड़की अपनी इच्छा से 25 वर्षीय युवक के साथ घर छोड़कर चली गई थी। बाद में दोनों ने विवाह किया और उनका एक बच्चा भी है। उन्होंने बताया कि अदालत द्वारा गठित समिति ने पॉक्सो कानून के क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है और किशोरों के समग्र कल्याण के लिए सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश की है।

पीठ ने यह भी कहा कि 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के मामलों में अक्सर माता-पिता की शिकायत के बाद सहमति वाले संबंध भी आपराधिक मामलों में बदल जाते हैं। ऐसे मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालतों को कई बार आरोपियों को दोषमुक्त करना पड़ता है।

केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वह किशोरों के लिए आयु-उपयुक्त शिक्षा तथा कक्षा छह से चरणबद्ध तरीके से पॉक्सो जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने सहित व्यापक सुधारों पर विचार कर रही है। वहीं, माधवी दीवान ने पॉक्सो मामलों की निगरानी के लिए एक डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की निगरानी पहले से ही उच्च न्यायालयों और राज्य स्तर पर की जा रही है तथा केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीकृत निगरानी की आवश्यकता पर उसने अपनी शंका व्यक्त की।

मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।