बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र और राज्य सरकार से मांगा जवाब

Judgement and Order

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और निर्वाचन आयोग से जवाब तलब किया है। याचिका में दावा किया गया है कि दीपक प्रकाश बिहार विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत निर्धारित अवधि से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) Surya Kant और न्यायमूर्ति V Mohana की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 164(4) केवल एक अस्थायी संवैधानिक छूट प्रदान करता है, जिसके तहत कोई गैर-विधायक अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे राज्य विधानमंडल का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनाया गया था, जबकि वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार सरकार के पतन के साथ मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके 22 दिन बाद, 7 मई 2026 को नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उन्हें फिर से मंत्री नियुक्त कर दिया।

याचिका में तर्क दिया गया है कि दीपक प्रकाश के लिए अनुच्छेद 164(4) के तहत उपलब्ध छह महीने की अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में उनकी पुनर्नियुक्ति संविधान की भावना के विपरीत है और यह एक ऐसा प्रयास है जिसके माध्यम से गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बिना जनादेश प्राप्त किए मंत्री पद पर बनाए रखने की कोशिश की गई।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 164(4) के तहत मिलने वाली छह महीने की छूट दोबारा शुरू नहीं की जा सकती। मुख्यमंत्री के बदलने, मंत्रिमंडल में फेरबदल, सरकार गिरने या पुनर्नियुक्ति के आधार पर इस अवधि को रीसेट नहीं किया जा सकता।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को बार-बार मंत्री बनाया जाने लगा तो इससे संसदीय लोकतंत्र, जनप्रतिनिधित्व, मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी और चुनावी जवाबदेही जैसे संवैधानिक सिद्धांत कमजोर होंगे। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से ‘क्वो वारंटो’ रिट जारी कर यह स्पष्ट करने की मांग की है कि दीपक प्रकाश किस संवैधानिक अधिकार के आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं और उनकी पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक तथा अवैध घोषित किया जाए।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 164(2), 164(4) और 141 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। साथ ही संवैधानिक नैतिकता, सुशासन और विधि के शासन के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह पुनर्नियुक्ति स्थापित संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप नहीं है।