ट्रिब्यूनलों में रिक्तियों से कामकाज ठप न हो, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सेवानिवृत्त सदस्यों का एक माह तक कार्यकाल बढ़ाने पर विचार करने को कहा

Supreme Court of India

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह अर्ध-न्यायिक संस्थाओं यानी ट्रिब्यूनलों के सेवानिवृत्त होने वाले अध्यक्षों, पीठासीन अधिकारियों और सदस्यों का कार्यकाल लगभग एक महीने तक बढ़ाने पर विचार करे, ताकि नए सदस्यों की नियुक्ति होने तक इन संस्थाओं का कामकाज प्रभावित न हो।

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने इस बात पर जोर दिया कि सदस्यों की कमी के कारण ट्रिब्यूनल निष्क्रिय नहीं होने चाहिए। अदालत का मानना है कि रिक्तियों के कारण मामलों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया बाधित नहीं होनी चाहिए।

केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि विभिन्न ट्रिब्यूनलों में नए सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। उन्होंने आग्रह किया कि कार्यकाल के अस्थायी या तदर्थ विस्तार से संबंधित याचिकाओं पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि सरकार पहले ही नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।

इससे पहले 8 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि विभिन्न ट्रिब्यूनलों के 248 सदस्य ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2026 के तहत कार्यकाल विस्तार के लिए पात्र पाए गए हैं। केंद्र ने यह भी बताया था कि पात्र सदस्यों की सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ट्रिब्यूनलों में लगातार सामने आने वाली रिक्तियों और उससे बढ़ने वाली लंबित मामलों की संख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि किसी सदस्य का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और उसके स्थान पर तत्काल नियुक्ति नहीं होती, तो संबंधित ट्रिब्यूनल की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

अदालत के रुख का उद्देश्य नियमित नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि नए सदस्यों की नियुक्ति होने तक संक्रमणकालीन व्यवस्था बनाए रखना है। एक महीने जैसे सीमित अवधि के विस्तार से मामलों की सुनवाई में अनावश्यक व्यवधान को रोका जा सकता है और न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता बनी रह सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह भी स्पष्ट करती है कि ट्रिब्यूनलों में रिक्तियां केवल प्रशासनिक विषय नहीं हैं, बल्कि उनका सीधा प्रभाव न्याय तक पहुंच, मामलों के निपटारे और न्यायिक लंबित मामलों पर पड़ता है। ऐसे में केंद्र के सामने नियमित नियुक्तियों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के साथ-साथ अंतरिम अवधि में ट्रिब्यूनलों के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने की चुनौती है।