भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान के आरजे-ओएन-90/1 (RJ-ON-90/1) तेल एवं गैस ब्लॉक से जुड़े वेदांता लिमिटेड और केंद्र सरकार के बीच चल रहे विवाद में केंद्र को दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) वापस लेने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) में अंतिम अवार्ड पारित हो जाने के बाद इस याचिका पर आगे सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रह गया है।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश इस दलील को स्वीकार किया कि विवाद में अब अंतिम मध्यस्थता अवार्ड आ चुका है, इसलिए एसएलपी निष्प्रभावी (Infructuous) हो गई है। अदालत ने याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार कानून के तहत उपलब्ध अपने सभी अधिकारों और उपायों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र रहेगी।
यह विवाद वर्ष 1995 में भारत सरकार, ओएनजीसी और शेल इंडिया प्रोडक्शन डेवलपमेंट कंपनी के बीच हुए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) से जुड़ा है। बाद में वेदांता लिमिटेड ने इस परियोजना में शेल की हिस्सेदारी का अधिग्रहण कर लिया। विवाद का मुख्य मुद्दा पीएससी के तहत वेदांता द्वारा अन्वेषण, विकास और उत्पादन लागत की वसूली तथा लाभ पेट्रोलियम (Profit Petroleum) की गणना से संबंधित था।
मामला मध्यस्थता में पहुंचा, जहां 22 अगस्त 2023 को मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने फाइनल पार्टियल अवार्ड (Final Partial Award) पारित किया। इस अवार्ड में पीएससी की विभिन्न शर्तों की व्याख्या की गई, लेकिन वास्तविक वित्तीय देनदारी की राशि का निर्धारण बाद के चरण के लिए छोड़ दिया गया।
इस अवार्ड के बाद वेदांता ने न्यायाधिकरण की व्याख्या के आधार पर अपने त्रैमासिक लाभ पेट्रोलियम खातों की तैयारी शुरू की। केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अंतिम वित्तीय देनदारी तय होने से पहले ऐसे समायोजन नहीं किए जाने चाहिए और इस संबंध में अंतरिम राहत की मांग की। हालांकि, मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने केंद्र की यह मांग अस्वीकार कर दी।
इसके बाद केंद्र सरकार ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 11 जुलाई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज करते हुए कहा कि भले ही फाइनल पार्टियल अवार्ड में अंतिम वित्तीय देनदारी तय नहीं की गई हो, लेकिन उसमें की गई संविदात्मक व्याख्या अवार्ड की तारीख से ही पक्षकारों पर बाध्यकारी हो जाती है, जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उस पर रोक न लगा दी जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वेदांता द्वारा न्यायाधिकरण की व्याख्या के अनुरूप लाभ पेट्रोलियम खातों की तैयारी करना मध्यस्थता अवार्ड का एकतरफा क्रियान्वयन नहीं है, बल्कि यह पीएससी के तहत उसकी संविदात्मक जिम्मेदारियों का निर्वहन है।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस निर्णय को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुनवाई के दौरान केंद्र ने बताया कि फाइनल पार्टियल अवार्ड पहले से ही दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती के अधीन है और इस बीच मध्यस्थता न्यायाधिकरण अंतिम अवार्ड भी पारित कर चुका है। इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार ने अपनी एसएलपी वापस लेने की अनुमति मांगी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अंतिम अवार्ड आने के बाद इस एसएलपी पर आगे सुनवाई का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया है। इसलिए अदालत ने याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए खारिज कर दिया और केंद्र सरकार को कानून के अनुसार उपलब्ध सभी अधिकार एवं वैधानिक उपाय सुरक्षित रखने की छूट भी प्रदान की।
