बिलासपुर, 5 अगस्त। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग 15 वर्ष की देरी से शुरू की गई विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई को मनमाना और कानून के विपरीत बताते हुए वरिष्ठ राज्य पुलिस सेवा अधिकारी इरफान-उल-रहीम खान के खिलाफ जारी आरोप-पत्र (चार्जशीट) और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बिना उचित कारण के लंबे समय बाद शुरू की गई विभागीय कार्रवाई निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह फैसला न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने इरफान-उल-रहीम खान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, डब्ल्यूपीएस क्रमांक 1883/2023, 2026:CGHC:34039 में सुनाया। याचिकाकर्ता वर्तमान में पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय (पीटीएस), माना, रायपुर में प्रभारी पुलिस अधीक्षक के रूप में पदस्थ हैं। उन्होंने 14 फरवरी 2023 को जारी विभागीय आरोप-पत्र को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने वर्ष 2007 में दूसरा विवाह किया था और जून 2008 में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 22(1) के तहत शासन से अनुमति के लिए आवेदन भी प्रस्तुत कर दिया था। उनका कहना था कि विभाग को दूसरे विवाह की जानकारी उसी समय मिल गई थी, लेकिन कई वर्षों तक कोई विभागीय कार्रवाई नहीं की गई। बाद में वर्ष 2017 और 2019 में दूसरी पत्नी द्वारा शिकायत किए जाने के बाद विभाग सक्रिय हुआ और वर्ष 2023 में आरोप-पत्र जारी कर दिया गया।
राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने पहले विवाह के रहते दूसरा विवाह किया और बाद में अनुमति मांगी, जो सेवा नियमों का उल्लंघन है। राज्य ने यह भी दावा किया कि अनुमति संबंधी आवेदन वर्ष 2013 में ही अस्वीकृत कर दिया गया था तथा विभागीय जांच नियमानुसार शुरू की गई थी। हालांकि अदालत ने पाया कि इस दावे के समर्थन में न तो कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर था और न ही जवाब में इसका उल्लेख किया गया था। इसके विपरीत सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड और विभागीय पत्राचार से यह संकेत मिलता था कि आवेदन लंबे समय तक विचाराधीन था।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई उचित समय के भीतर शुरू की जानी चाहिए। यदि विभाग को कथित कदाचार की जानकारी होने के बावजूद वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तो बाद में अचानक कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि “विभागीय कार्यवाही का उद्देश्य प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखना है, न कि किसी कर्मचारी के सिर पर अनिश्चितकाल तक तलवार लटकाए रखना।”
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम चमन लाल गोयल, स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम बनी सिंह, अमरेश श्रीवास्तव बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश तथा स्टेट ऑफ एम.पी. बनाम आर.एन. मिश्रा सहित कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि नियोक्ता लंबे समय तक किसी कथित कदाचार पर कार्रवाई नहीं करता और कर्मचारी को सेवा में बनाए रखता है, तो इसे कई परिस्थितियों में कदाचार को स्वीकार या क्षमा किए जाने के रूप में भी देखा जा सकता है।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह विवाद दूसरे विवाह की वैधता का नहीं, बल्कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने में हुई असाधारण देरी का है। इसलिए सेवा नियमों की प्रधानता से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का इस मामले में सीधा लाभ राज्य को नहीं मिल सकता।
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि लगभग 15 वर्ष बाद बिना संतोषजनक कारण के शुरू की गई विभागीय कार्रवाई मनमानी, अनुचित और विभागीय अधिकारों का दुरुपयोग है। इसी आधार पर अदालत ने 14 फरवरी 2023 के आरोप-पत्र को निरस्त करते हुए उससे संबंधित सभी विभागीय कार्यवाहियों को भी समाप्त कर दिया।
