राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की कोलकाता पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में बर्गंडी लाइफ स्टाइल प्राइवेट लिमिटेड के व्यक्तिगत गारंटर संतोष झावर के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दे दी है। यह कार्रवाई भारतीय बैंक द्वारा दायर याचिका पर की गई।
मामले में बैंक ने बताया कि कंपनी को वर्ष 2010 में विभिन्न ऋण सुविधाएं प्रदान की गई थीं, जिनके लिए संतोष झावर ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। ऋण खाते के 31 मार्च 2016 को एनपीए घोषित होने के बाद बैंक ने सरफेसी अधिनियम के तहत मांग नोटिस जारी किया था। बाद में कंपनी ने कई बार एकमुश्त समझौते (ओटीएस) के प्रस्ताव और अपनी बैलेंस शीट में बकाया राशि स्वीकार की।
व्यक्तिगत गारंटर ने यह दलील दी कि बैंक की याचिका समय-सीमा से बाहर है, लेकिन न्यायाधिकरण ने इसे खारिज कर दिया। NCLT ने कहा कि मूल उधारकर्ता द्वारा लिखित रूप में ऋण स्वीकार किए जाने से परिसीमा अवधि (Limitation Period) फिर से शुरू हो जाती है और इसका लाभ व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ कार्रवाई में भी मिलता है।
न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ दिवाला कार्यवाही शुरू करने के लिए पहले कंपनी के खिलाफ कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया शुरू करना आवश्यक नहीं है। पीठ ने कहा कि वित्तीय लेनदार सीधे गारंटर के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।
आदेश के तहत संतोष झावर के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है और आईबीसी की धारा 101 के तहत मोरेटोरियम भी लागू कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप गारंटर के विरुद्ध ऋण संबंधी लंबित या नई कानूनी कार्यवाहियों पर रोक रहेगी तथा उनकी संपत्तियों के हस्तांतरण पर भी प्रतिबंध रहेगा।
यह फैसला बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ है कि मूल उधारकर्ता द्वारा ऋण की स्वीकृति व्यक्तिगत गारंटर की जिम्मेदारी को भी जीवित रखती है और लेनदार सीधे गारंटर के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
