छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वेस्टिन गोवा होटल की ED अटैचमेंट रद्द करने से किया इनकार, ₹110 करोड़ का मामला

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गोवा स्थित होटल वेस्टिन की प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की गई प्रोविजनल अटैचमेंट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। डॉ. राहुल अग्रवाल और पैसिफिका होटल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने PMLA की धारा 5(1) के तहत 28 मई 2026 को जारी अटैचमेंट आदेश को रद्द करने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 25 अगस्त 2026 को आदेश पारित करते हुए कहा कि इस स्तर पर मामले के विवादित तथ्यों की विस्तृत जांच रिट क्षेत्राधिकार में करना उचित नहीं होगा।

मामला कथित छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग की जांच से संबंधित है। ED के अनुसार, शराब कारोबार में कथित अवैध कमीशन और अन्य माध्यमों से बड़ी मात्रा में अपराध से अर्जित आय यानी Proceeds of Crime (PoC) पैदा हुई। इसी जांच के आधार पर EOW/ACB रायपुर ने जनवरी 2024 में IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और 120B तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7 और 12 के तहत FIR दर्ज की थी। इसके बाद ED ने अप्रैल 2024 में ECIR दर्ज कर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका कथित शराब घोटाले से कोई संबंध नहीं है और न ही उन्हें FIR, ED की अभियोजन शिकायतों या EOW/ACB की चार्जशीट में आरोपी बनाया गया है। उनका मुख्य तर्क होटल की खरीद में कथित ₹60 करोड़ के नकद भुगतान को लेकर था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, आयकर विभाग ने पहले इस राशि को अघोषित आय माना था, लेकिन बाद में CIT(A) ने ₹60 करोड़ की आय में की गई बढ़ोतरी को हटा दिया और ITAT ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। उनका कहना था कि इससे स्पष्ट है कि राशि का स्रोत उनके वैध कारोबारी संचालन से उपलब्ध नकदी थी और ED इसे बिना ठोस मनी ट्रेल के अपराध की आय नहीं बता सकता।

दूसरी ओर, ED ने दावा किया कि शराब घोटाले से जुड़े कथित अपराध की आय में से कुल ₹110 करोड़ विजय कुमार अग्रवाल तक पहुंचाए गए थे। ED के अनुसार, इसमें ₹40 करोड़ नकद सीधे दिए गए, जबकि ₹70 करोड़ एक अन्य माध्यम से पहुंचाए गए। जांच एजेंसी ने विभिन्न बयानों और अन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए दावा किया कि यह रकम गोवा में होटल खरीदने के लिए इस्तेमाल की गई थी। ED ने यह भी कहा कि होटल की खरीद के दौरान ₹60 करोड़ नकद भुगतान स्वयं राहुल अग्रवाल द्वारा किए जाने की बात उनके बयान से सामने आती है।

ED ने अपने पक्ष में कई अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का भी उल्लेख किया। एजेंसी के अनुसार, Sameer Biyani ने बयान में कहा कि उसने और Vishal Saxena ने राहुल अग्रवाल से ₹60 करोड़ नकद कई किस्तों में लिए थे। Vishal Saxena ने भी होटल के लिए ₹50 करोड़ बैंकिंग माध्यम से और अतिरिक्त ₹60 करोड़ नकद भुगतान की पुष्टि की थी। ED ने यह भी बताया कि बाद में Vishal Saxena को Pacifica Hotels India Private Limited के निदेशक मंडल में शामिल किया गया। एजेंसी ने इन घटनाओं को कथित धन के स्रोत और होटल की खरीद के बीच संबंध स्थापित करने वाली परिस्थितियों के रूप में पेश किया।

हाईकोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या Article 226 के तहत रिट याचिका के माध्यम से PMLA की प्रोविजनल अटैचमेंट को उस समय चुनौती दी जा सकती है, जब कानून में इसके खिलाफ विस्तृत वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध है। ED ने दलील दी कि PMLA में धारा 5 के तहत अटैचमेंट के बाद धारा 8 में Adjudicating Authority के समक्ष पूरा सुनवाई तंत्र मौजूद है। इसके बाद धारा 26 के तहत Appellate Tribunal और धारा 42 के तहत हाईकोर्ट में अपील का प्रावधान है।

अदालत ने इस वैधानिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के समक्ष ED ने बताया कि धारा 5(5) के तहत अटैचमेंट के संबंध में शिकायत Adjudicating Authority के समक्ष दाखिल की जा चुकी है और याचिकाकर्ताओं को नोटिस भी प्राप्त हो चुका है। ऐसे में वे दस्तावेज, साक्ष्य और अपनी आपत्तियां वहां प्रस्तुत कर सकते हैं। धारा 8 के तहत प्राधिकरण यह तय करेगा कि संबंधित संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी है या नहीं और अटैचमेंट की पुष्टि की जानी चाहिए या नहीं।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि PMLA की Adjudicating Authority का गठन कानून के अनुरूप नहीं है और एकल सदस्य के माध्यम से कार्यवाही किए जाने का मुद्दा coram non judice का है। अदालत ने इस दलील को भी वर्तमान प्रोविजनल अटैचमेंट को रद्द करने का आधार नहीं माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 5 के तहत ED अधिकारी द्वारा की गई प्रोविजनल अटैचमेंट और बाद में Adjudicating Authority के समक्ष होने वाली धारा 8 की कार्यवाही अलग-अलग चरण हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मामले में कई ऐसे तथ्य हैं जिन पर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। ₹60 करोड़ नकद का वास्तविक स्रोत क्या था, क्या यह वैध कारोबारी नकदी थी या कथित अपराध से अर्जित धन, ₹110 करोड़ की कथित रकम विजय कुमार अग्रवाल तक कैसे पहुंची और क्या उसका इस्तेमाल होटल की खरीद में हुआ, जैसे सवालों का निर्धारण साक्ष्यों की जांच के बाद किया जाना जरूरी है। अदालत ने ऐसे विवादित तथ्य Article 226 के तहत संक्षिप्त रिट कार्यवाही में तय करना उचित नहीं समझा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोविजनल अटैचमेंट को बरकरार रखना इस बात का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है कि होटल निश्चित रूप से अपराध की आय है या याचिकाकर्ताओं ने मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध किया है। अंतिम निर्धारण PMLA में निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत होगा। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित तथ्यों और साक्ष्यों पर सक्षम प्राधिकरण के समक्ष विचार किया जा सकता है।

PMLA के तहत Proceeds of Crime का अर्थ ऐसी संपत्ति से है जो किसी अनुसूचित अपराध से संबंधित आपराधिक गतिविधि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हुई हो। धारा 5 ED को कुछ निर्धारित परिस्थितियों में ऐसी संपत्ति को अस्थायी रूप से अटैच करने की शक्ति देती है। वहीं धारा 8 के तहत Adjudicating Authority अटैचमेंट की पुष्टि या उसे समाप्त करने का निर्णय लेती है। इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी वैधानिक प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

अंततः छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने WPCR No. 473/2026 में दायर याचिका को खारिज कर दिया। इसका तत्काल प्रभाव यह है कि 28 मई 2026 का ED का प्रोविजनल अटैचमेंट आदेश बरकरार रहेगा और होटल वेस्टिन गोवा से संबंधित विवाद अब PMLA की वैधानिक adjudication प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा। हालांकि, होटल को अपराध की आय घोषित करने का अंतिम निर्णय अभी बाकी है।