छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: मध्यस्थता अवॉर्ड में दखल का अधिकार बेहद सीमित, अपील खारिज

JUSTICE NARENDRA KUMAR VYAS, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मध्यस्थ (Arbitrator) के अवॉर्ड को पहले ही मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत सही ठहराया जा चुका है, तो धारा 37 के तहत अपीलीय अदालत का हस्तक्षेप बेहद सीमित होता है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने वाहन हायर-परचेज विवाद से जुड़े मामले में दायर अपील खारिज करते हुए कहा कि अदालत केवल इसलिए मध्यस्थ के निर्णय में दखल नहीं दे सकती क्योंकि किसी अन्य दृष्टिकोण की संभावना मौजूद है।

अदालत ने यह भी माना कि वर्ष 2015 के संशोधन से पहले केवल इस आधार पर किसी कंपनी के कर्मचारी को मध्यस्थ नियुक्त करना अवैध नहीं था, जब तक उसके पक्षपात या व्यक्तिगत हित का ठोस प्रमाण न हो। साथ ही, रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि अपीलकर्ता को सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया था और मध्यस्थता की कार्यवाही कानून के अनुरूप हुई। हाईकोर्ट ने कहा कि अवॉर्ड में कोई “स्पष्ट कानूनी त्रुटि” या “लोक नीति का उल्लंघन” नहीं है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।