छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ जारी लाखों रुपये की रिकवरी कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी पर वित्तीय दायित्व तय करने और उसकी पेंशन या ग्रेच्युटी से राशि वसूलने से पहले विधि अनुसार नियमित विभागीय जांच अनिवार्य है।
मामला कबीरधाम जिले में वर्ष 2016-17 के दौरान मनरेगा के तहत किए गए सरी बांध मरम्मत कार्यों में कथित 11.42 लाख रुपये के अतिरिक्त व्यय से जुड़ा था। विभाग ने जांच के आधार पर अधिकारियों पर जिम्मेदारी तय करते हुए 5.13 लाख रुपये की रिकवरी का आदेश जारी किया था और सेवानिवृत्ति लाभों से कटौती की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।

न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने पाया कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ न तो आरोप पत्र जारी किया गया, न नियमित विभागीय जांच हुई और न ही उन्हें साक्ष्यों का सामना करने या अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का अवसर दिया गया। अदालत ने कहा कि केवल प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर पेंशन और ग्रेच्युटी से वसूली नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन और ग्रेच्युटी कोई अनुग्रह राशि नहीं बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ऐसी कटौती कानूनन टिकाऊ नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने विवादित रिकवरी आदेशों को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।
