मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के नेता और राज्यसभा सांसद एए रहीम ने जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा फेस रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (एफआरटी) और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी तकनीकों के कथित उपयोग को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में मांग की गई है कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक प्रदर्शनों में बिना किसी वैधानिक कानून के बायोमेट्रिक निगरानी का उपयोग असंवैधानिक घोषित किया जाए और संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने तक ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस ने छात्र प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए फेस रिकग्निशन सिस्टम, एआई आधारित स्मार्ट ग्लास, फिंगरप्रिंट पहचान उपकरण, ड्रोन, सीसीटीवी कैमरे और मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल व्हीकल जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कार्रवाई किसी वैधानिक अधिकार के बिना की गई, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ।
यह मामला ऑनलाइन समूह ‘कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ द्वारा आयोजित छात्र आंदोलन से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी उस समय के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं को लेकर हुए इन प्रदर्शनों के बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने पर आंदोलन समाप्त हो गया था।
याचिका के अनुसार प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने एनसीआरबी के ‘अभिज्ञान’ मोबाइल फिंगरप्रिंट पहचान एप्लिकेशन के माध्यम से प्रदर्शनकारियों के फिंगरप्रिंट का मिलान स्थायी आपराधिक डेटाबेस से किया। साथ ही एआई आधारित फेस रिकग्निशन तकनीक के जरिए लोगों की पहचान कर उनका डेटा एकत्र, संसाधित और मिलान किया गया, जबकि इसके लिए कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि न तो दिल्ली पुलिस के सार्वजनिक प्रदर्शनों से संबंधित स्थायी आदेश और न ही आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की बायोमेट्रिक जानकारी एकत्र करने या फेस रिकग्निशन तकनीक के उपयोग की अनुमति देते हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जवाब का हवाला देते हुए कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने फेस रिकग्निशन तकनीक लागू करने से पहले कोई प्राइवेसी इम्पैक्ट असेसमेंट भी नहीं कराया।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) का उल्लेख करते हुए कहा है कि निजता के अधिकार में हस्तक्षेप करने वाली किसी भी सरकारी कार्रवाई को वैधता, वैध उद्देश्य और अनुपातिकता की संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरना आवश्यक है। याचिका का दावा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में फेस रिकग्निशन तकनीक का उपयोग इन मानकों पर खरा नहीं उतरता।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि हजारों प्रदर्शनकारियों का बायोमेट्रिक डेटा उनकी जानकारी और सहमति के बिना एकत्र कर अनिश्चितकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। डेटा के संग्रह, उपयोग, संरक्षण अवधि, सुरक्षा उपायों और निगरानी तंत्र के संबंध में कोई सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
एए रहीम ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) तथा निजी कंपनियों आदित्य इन्फोटेक लिमिटेड (सीपी प्लस) और डाइमेंशन एनएक्सजी प्राइवेट लिमिटेड (अजनालेंस) को पक्षकार बनाया है। याचिका में आरोप है कि इन कंपनियों ने निगरानी तकनीक उपलब्ध कराई और प्रदर्शन के दौरान एकत्र किए गए वीडियो, फेस टेम्पलेट और अन्य बायोमेट्रिक डेटा तक उनकी पहुंच हो सकती है, जबकि इससे संबंधित किसी डेटा साझाकरण समझौते या गोपनीयता व्यवस्था का सार्वजनिक खुलासा नहीं किया गया है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में फेस रिकग्निशन तकनीक के उपयोग को असंवैधानिक घोषित किया जाए, संसद द्वारा कानून बनने तक ऐसी निगरानी पर रोक लगाई जाए, उपयोग की गई तकनीकों, डेटाबेस और निजी कंपनियों से जुड़े सभी समझौतों का खुलासा किया जाए तथा जिन लोगों पर कोई आपराधिक आरोप नहीं है, उनका बायोमेट्रिक डेटा नष्ट किया जाए। साथ ही प्रभावित व्यक्तियों के लिए ऐसा तंत्र विकसित करने की भी मांग की गई है, जिससे वे यह जान सकें कि उनका बायोमेट्रिक डेटा एकत्र किया गया है या नहीं और आवश्यकता पड़ने पर उसे हटाने का अनुरोध कर सकें।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि इसी मुद्दे से संबंधित एक अन्य मामला दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है, जहां केंद्र सरकार से पूछा गया है कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान निगरानी तकनीकों के उपयोग के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया या नियामक ढांचा मौजूद है या नहीं। वहीं केंद्र सरकार ने अब तक सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शन की वीडियोग्राफी को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है।
