दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र का तर्क, पब्लिक प्रिमाइसेस एक्ट के तहत बेदखली कार्यवाही पर रोक नहीं लगा सकती अदालत

Delhi High Court

दिल्ली हाईकोर्ट में मंगलवार को केंद्र सरकार ने दिल्ली जिमखाना क्लब से जुड़े बेदखली विवाद में दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि पब्लिक प्रिमाइसेस (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत शुरू की गई कार्यवाही पर अदालत अंतरिम रोक नहीं लगा सकती। केंद्र ने दलील दी कि इस कानून के तहत एस्टेट ऑफिसर द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस और बेदखली प्रक्रिया को चुनौती देने का अधिकार सीमित है।

न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने कहा कि अधिनियम की धारा 15 स्पष्ट रूप से अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है। इस प्रावधान के अनुसार, सार्वजनिक परिसरों से बेदखली से संबंधित मामलों में न तो कोई दीवानी कार्यवाही स्वीकार की जा सकती है और न ही एस्टेट ऑफिसर की कार्रवाई पर रोक लगाने का आदेश दिया जा सकता है।

केंद्र ने यह भी तर्क दिया कि पट्टा समाप्त करने की वैधता, सार्वजनिक उद्देश्य की आवश्यकता, मुआवजा तथा बेदखली से जुड़े अन्य सभी विवादों पर फैसला करने का अधिकार केवल एस्टेट ऑफिसर को है। इसलिए याचिकाकर्ता अंतरिम राहत के माध्यम से वही हासिल करना चाहते हैं, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता।

सरकार ने यह भी कहा कि एस्टेट ऑफिसर के समक्ष पूरी वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध है, जहां क्लब अपनी सभी कानूनी और तथ्यात्मक आपत्तियां उठा सकता है। इसलिए यह कहना कि कारण बताओ नोटिस पहले से ही निर्णय तय कर चुका है, सही नहीं है।

यह आवेदन विजय खुराना और दिल्ली जिमखाना क्लब स्टाफ वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से लंबित दीवानी वादों में दायर किए गए हैं। इन याचिकाओं में एस्टेट ऑफिसर द्वारा 29 जून को जारी कारण बताओ नोटिस पर रोक लगाने की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत को बताया कि केंद्र का जवाबी हलफनामा सोमवार देर रात ही प्राप्त हुआ है, इसलिए प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए समय दिया जाए। इस पर अदालत ने पक्षकारों को जल्द से जल्द अपनी लिखित दलीलें पूरी करने का निर्देश दिया, पहले से लागू अंतरिम संरक्षण जारी रखा और मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर के लिए निर्धारित कर दी। एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल उपस्थित हुए, जबकि केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने पक्ष रखा।

यह विवाद वर्ष 1928 में हुए स्थायी पट्टे की क्लॉज 4 से जुड़ा है, जिसके तहत यदि भूमि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आवश्यक हो तो केंद्र सरकार पट्टा समाप्त कर परिसर का पुनः कब्जा ले सकती है। केंद्र का कहना है कि लुटियंस दिल्ली स्थित 27.3 एकड़ की यह संपत्ति रक्षा अवसंरचना, सार्वजनिक सुरक्षा और एकीकृत सरकारी सुविधाओं के विस्तार के लिए आवश्यक है। कब्जा मिलने के बाद पूरी संपत्ति राष्ट्रपति के नाम भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) के माध्यम से हस्तांतरित हो जाएगी।

वहीं, दिल्ली जिमखाना क्लब का कहना है कि प्रस्तावित बेदखली से क्लब के लगभग 14,000 सदस्यों और 500 से अधिक कर्मचारियों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। क्लब ने यह भी बताया कि वर्तमान में उसका संचालन राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा नियुक्त सरकारी समिति कर रही है और उसके प्रशासन तथा वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। क्लब ने अदालत से आग्रह किया है कि लंबित कानूनी कार्यवाही पूरी होने तक कोई कठोर कार्रवाई न की जाए तथा यदि भविष्य में स्थानांतरण आवश्यक हो तो वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जाए।

इससे पहले 26 मई को भी दिल्ली हाईकोर्ट ने क्लब को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, केंद्र सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया था कि कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना क्लब से कब्जा नहीं लिया जाएगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर को होगी।