राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की कोर्ट-V ने स्पाइसजेट लिमिटेड के खिलाफ दायर एक दिवाला याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायाधिकरण ने माना कि पायलट कैप्टन देवेश बब्यान द्वारा दावा की गई वेतन बकाया राशि न केवल न्यूनतम वैधानिक सीमा से नीचे आती है, बल्कि पक्षों के बीच पहले से मौजूद वास्तविक विवाद (Pre-Existing Dispute) भी है, जिसके कारण दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू नहीं की जा सकती।
यह मामला कैप्टन देवेश बब्यान द्वारा स्पाइसजेट के खिलाफ IBC की धारा 9 के तहत दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि अप्रैल 2020 से अगस्त 2022 के बीच सेवाएं देने के बावजूद उन्हें उनके अनुबंध के अनुसार पूरा वेतन नहीं मिला। उनके अनुसार कुल ₹1.83 करोड़ देय थे, जिनमें से स्पाइसजेट ने लगभग ₹69.61 लाख का भुगतान किया और ₹1.13 करोड़ से अधिक की राशि बकाया रही। उन्होंने 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज जोड़ते हुए कुल दावा लगभग ₹1.70 करोड़ बताया।
स्पाइसजेट ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान कर्मचारियों के लिए संशोधित वेतन संरचना लागू की गई थी, जिसे याचिकाकर्ता ने जून 2020 में स्वीकार किया था। एयरलाइन ने यह भी दावा किया कि याचिकाकर्ता की सेवाएं अगस्त 2022 में समाप्त कर दी गई थीं और बाद में उनका फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तैयार किया गया था। कंपनी के अनुसार लगभग ₹3.95 लाख का भुगतान शेष था, जबकि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राशि विवादित थी।
मामले की सुनवाई के दौरान NCLT ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि कर्मचारियों के वेतन और रोजगार संबंधी देनदारियां IBC की धारा 5(21) के तहत “ऑपरेशनल डेब्ट” की श्रेणी में आती हैं। न्यायाधिकरण ने कहा कि “रोजगार संबंधी देनदारियां ऑपरेशनल डेब्ट हैं और ऐसे मामलों में धारा 9 के तहत याचिका दायर की जा सकती है।” हालांकि, केवल इस आधार पर CIRP शुरू नहीं किया जा सकता जब अन्य कानूनी बाधाएं मौजूद हों।
न्यायाधिकरण ने पाया कि याचिकाकर्ता के दावे में ₹47.52 लाख की राशि अप्रैल 2020 से मार्च 2021 की अवधि से संबंधित थी। यह अवधि IBC की धारा 10A के अंतर्गत आती है, जिसे कोविड-19 महामारी के दौरान लागू किया गया था। इस प्रावधान के तहत 25 मार्च 2020 से 24 मार्च 2021 के बीच उत्पन्न डिफॉल्ट के आधार पर CIRP शुरू करने पर स्थायी रोक लगाई गई थी। NCLT ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Ramesh Kymal v. Siemens Gamesa Renewable Power Pvt. Ltd. का हवाला देते हुए कहा कि इस अवधि के डिफॉल्ट को दिवाला कार्यवाही के आधार के रूप में कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप ₹47.52 लाख की राशि को गणना से बाहर कर दिया गया।
इसके अलावा न्यायाधिकरण ने ब्याज के दावे को भी स्वीकार नहीं किया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई समझौता नहीं है जिसके आधार पर 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की जा सके। NCLAT के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि बिना किसी अनुबंधीय प्रावधान या स्पष्ट स्वीकृति के ऑपरेशनल क्रेडिटर ब्याज को मूल देनदारी में जोड़कर IBC की न्यूनतम सीमा पूरी नहीं कर सकता।
NCLT ने यह भी पाया कि दोनों पक्षों के बीच वेतन देनदारियों की राशि को लेकर लंबे समय से विवाद मौजूद था। स्पाइसजेट ने अपने जवाब में कहा था कि कर्मचारी ने संशोधित अनुबंध स्वीकार किया था और उसी के अनुसार भुगतान किया गया। ईमेल रिकॉर्ड में भी फुल एंड फाइनल सेटलमेंट को लेकर मतभेद दिखाई दिए। न्यायाधिकरण ने कहा कि ऐसे विवादित तथ्यों का निर्णय IBC की संक्षिप्त कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय GLS Films Industries Pvt. Ltd. v. Chemical Suppliers India Pvt. Ltd. का भी उल्लेख किया गया। NCLT ने कहा कि यदि कोई वास्तविक और संभावित पूर्व-विद्यमान विवाद मौजूद है, तो धारा 9 की याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायाधिकरण का कहना था कि “यह देखना पर्याप्त है कि विवाद वास्तविक है और काल्पनिक या मनगढ़ंत नहीं है; उसके गुण-दोष का परीक्षण इस स्तर पर नहीं किया जाता।”
अंततः NCLT ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 10A के अंतर्गत आने वाली राशि हटाने और ब्याज को बाहर रखने के बाद कथित डिफॉल्ट ₹1 करोड़ की वैधानिक सीमा से नीचे रह जाता है। साथ ही, वेतन देनदारी को लेकर पहले से मौजूद विवाद भी साबित होता है। इन दोनों कारणों से स्पाइसजेट के खिलाफ दायर धारा 9 की याचिका स्वीकार्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।
यह फैसला कर्मचारियों और कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि वेतन बकाया के मामलों में IBC का उपयोग तभी किया जा सकता है जब दावा निर्विवाद हो, न्यूनतम वैधानिक सीमा पूरी करता हो और उस पर धारा 10A जैसी कानूनी बाधाएं लागू न हों। केवल वेतन विवाद को दिवाला कार्यवाही में बदलना संभव नहीं है, विशेषकर तब जब भुगतान की राशि और अनुबंध की शर्तों को लेकर वास्तविक विवाद पहले से मौजूद हो।
