नई दिल्ली – आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) की दिल्ली पीठ ने स्ट्रॉमन डेंटल इंडिया LLP को बड़ा झटका देते हुए ₹16.16 करोड़ की गुडविल (Goodwill) पर दावा किए गए मूल्यह्रास (Depreciation) को अस्वीकार कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने माना कि जिस बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट के आधार पर गुडविल का दावा किया गया था, वह न तो पंजीकृत (Registered) था और न ही पूरी तरह हस्ताक्षरित (Signed) था। ऐसे दस्तावेज को कानून की नजर में वैध आधार नहीं माना जा सकता।
मामला आकलन वर्ष 2017-18 से जुड़ा है। स्ट्रॉमन डेंटल इंडिया LLP ने दावा किया था कि उसने इक्विनॉक्स सेल्स इंडिया (ESI) का कारोबार लगभग ₹134.51 करोड़ में अधिग्रहित किया था। कंपनी के अनुसार, इस राशि में से लगभग ₹5.23 करोड़ मूर्त परिसंपत्तियों (Tangible Assets) के लिए थे, जबकि शेष ₹129.28 करोड़ विभिन्न व्यावसायिक एवं वाणिज्यिक अधिकारों के रूप में गुडविल थे। इसी गुडविल पर LLP ने ₹16.16 करोड़ के मूल्यह्रास का दावा किया था।
आयकर विभाग ने जांच के दौरान पाया कि संबंधित गुडविल पूर्व स्वामी की पुस्तकों में मौजूद नहीं थी। विभाग का कहना था कि अधिग्रहण के बाद बनाई गई गुडविल पर मूल्यह्रास का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके आधार पर आकलन अधिकारी ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32 सहित अन्य प्रावधानों का हवाला देते हुए पूरा दावा खारिज कर दिया। बाद में राष्ट्रीय फेसलेस अपीलीय केंद्र (NFAC) ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।
अपील पर सुनवाई करते हुए ITAT ने बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट की जांच की। ट्रिब्यूनल ने पाया कि समझौता न केवल अपंजीकृत था बल्कि खरीदार की ओर से उस पर हस्ताक्षर भी नहीं थे। पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि विक्रेता और खरीदार के बीच संबंध मौजूद थे, जबकि अपीलकर्ता ने दावा किया था कि दोनों पक्षों के बीच कोई संबंध नहीं था। यह तथ्य भी उसके दावों के विपरीत पाया गया।
ट्रिब्यूनल ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिना हस्ताक्षर वाला दस्तावेज केवल “एक अनाम कागज” है, जिस पर कोई कानूनी भरोसा नहीं किया जा सकता। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय के CIT बनाम बलबीर सिंह मैनी मामले के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अपंजीकृत समझौते का कानून में कोई प्रभाव नहीं होता और उसे लागू नहीं कराया जा सकता।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब मूल बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट ही कानूनी रूप से मान्य नहीं है, तो उससे उत्पन्न गुडविल को भी मान्यता नहीं दी जा सकती। परिणामस्वरूप, ऐसी गुडविल पर मूल्यह्रास का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला उन कंपनियों और व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो अधिग्रहण, स्लंप सेल या पुनर्गठन के दौरान गुडविल पर कर लाभ का दावा करती हैं। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल लेखांकन प्रविष्टियों या मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर कर लाभ नहीं मिल सकता, बल्कि संबंधित लेनदेन को वैध और विधिक रूप से लागू करने योग्य दस्तावेजों द्वारा सिद्ध करना भी आवश्यक है।
अंततः ITAT की दिल्ली पीठ ने स्ट्रॉमन डेंटल इंडिया LLP की अपील खारिज करते हुए ₹16.16 करोड़ के मूल्यह्रास दावे को अस्वीकार करने के आयकर विभाग के निर्णय को सही ठहराया।
