कोलकाता स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने दिवालियापन और परिसमापन प्रक्रिया से गुजर रही डूटेरियाह एंड कालेज वैली टी प्राइवेट लिमिटेड को एक चलती हुई कंपनी (Going Concern) के रूप में बेचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। हालांकि न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि परिसमापक कंपनी की परिसंपत्तियों, अधिकारों, लाइसेंसों और अन्य व्यावसायिक हितों को वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत समेकित पैकेज या स्लंप सेल के माध्यम से बेचने के लिए स्वतंत्र होगा। यह फैसला दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 और अक्टूबर 2025 में लागू हुए संशोधित परिसमापन विनियमों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामले की सुनवाई एनसीएलटी कोलकाता पीठ की न्यायिक सदस्य बिदिशा बनर्जी और तकनीकी सदस्य कमोडोर सिद्धार्थ मिश्रा की खंडपीठ ने की। कंपनी के परिसमापक संजीव झुनझुनवाला ने आईबीसी की धारा 60(5) और एनसीएलटी नियम, 2016 के तहत आवेदन दायर कर कंपनी को “एज़ इज़ व्हेयर इज़” और “एज़ इज़ व्हाट इज़” आधार पर गोइंग कंसर्न के रूप में बेचने की अनुमति मांगी थी। वैकल्पिक रूप से उन्होंने कंपनी के सभी अधिकारों, अनुबंधों, लाइसेंसों, स्वीकृतियों तथा स्वयं कंपनी की विधिक इकाई सहित समग्र बिक्री की अनुमति भी मांगी थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी को दिसंबर 2017 में आईबीसी की धारा 9 के तहत कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) में भेजा गया था। सितंबर 2018 में एक समाधान योजना को मंजूरी दी गई थी, लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं हो सका। बाद में अक्टूबर 2025 में उस आदेश को वापस लेते हुए कंपनी के परिसमापन का आदेश दिया गया और परिसमापक नियुक्त किया गया।
परिसमापक ने न्यायाधिकरण को बताया कि कंपनी दार्जिलिंग में स्थित डूटेरियाह, कालेज वैली और पेशोक सहित कई चाय बागानों तथा दो चाय कारखानों का संचालन करती है। उनका तर्क था कि इन इकाइयों का संचालन परस्पर जुड़ा हुआ है और परिसंपत्तियों की अलग-अलग बिक्री से उनका आर्थिक मूल्य काफी कम हो जाएगा। हितधारक परामर्श समिति (SCC) ने भी यह राय दी थी कि कंपनी को एक समग्र इकाई के रूप में बेचने से अधिक मूल्य प्राप्त हो सकता है तथा श्रमिकों और व्यवसायिक गतिविधियों का संरक्षण होगा।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि 14 अक्टूबर 2025 को भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) ने परिसमापन प्रक्रिया विनियमों में संशोधन कर विनियम 32(e), 32(f) और 32A को हटा दिया था। इन प्रावधानों के तहत पहले किसी कॉरपोरेट देनदार को परिसमापन के दौरान गोइंग कंसर्न के रूप में बेचा जा सकता था। संशोधन के बाद विनियम 32 केवल परिसंपत्तियों की स्वतंत्र बिक्री, स्लंप सेल, परिसंपत्तियों के समूह की बिक्री या अलग-अलग हिस्सों में बिक्री की अनुमति देता है।
न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में कहा कि “विनियम 32(e) को हटाए जाने के बाद गोइंग कंसर्न के रूप में बिक्री का तरीका अब उपलब्ध नहीं है और न्यायाधिकरण ऐसे प्रावधान के तहत राहत नहीं दे सकता जो अब अस्तित्व में ही नहीं है।” पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हितधारक समिति की सिफारिश न्यायाधिकरण पर बाध्यकारी नहीं है और संशोधित विनियमों के लागू होने के बाद पुरानी व्यवस्था के आधार पर अनुमति नहीं दी जा सकती।
पीठ ने आगे कहा कि यदि न्यायालय कंपनी को उसकी विधिक इकाई सहित बेचने की अनुमति देता है तो यह अप्रत्यक्ष रूप से उस व्यवस्था को पुनर्जीवित करने जैसा होगा जिसे नियामक प्राधिकरण ने जानबूझकर समाप्त कर दिया है। इसलिए कंपनी को एक निरंतर विधिक इकाई या गोइंग कंसर्न के रूप में बेचने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
हालांकि एनसीएलटी ने यह भी माना कि आईबीसी की धारा 35 और वर्तमान विनियम 32 के तहत परिसमापक को परिसंपत्तियों के अधिकतम मूल्य सृजन के लिए उचित तरीके अपनाने का अधिकार है। न्यायाधिकरण ने कहा कि परिसमापक कंपनी की परिसंपत्तियों, अधिकारों, लाइसेंसों, अनुबंधीय अधिकारों और अन्य हस्तांतरणीय हितों को एक समेकित परिसंपत्ति पैकेज के रूप में या स्लंप सेल के जरिए बेचने की संभावना तलाश सकता है। लेकिन किसी खरीदार को किसी पट्टे, लाइसेंस, अनुमति या वैधानिक स्वीकृति के स्वतः नवीनीकरण का अधिकार प्राप्त नहीं होगा और ऐसे अधिकार संबंधित सक्षम प्राधिकरणों की मंजूरी के अधीन रहेंगे।
यह फैसला दिवालियापन कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि अक्टूबर 2025 के बाद शुरू या लंबित परिसमापन मामलों में गोइंग कंसर्न सेल की पुरानी व्यवस्था का लाभ नहीं लिया जा सकता, जब तक कि बिक्री प्रक्रिया संशोधन से पहले वास्तविक रूप से शुरू न हो चुकी हो। साथ ही आदेश यह संकेत देता है कि परिसमापकों को अब मूल्य अधिकतमकरण के लिए स्लंप सेल और परिसंपत्ति पैकेज बिक्री जैसे वैकल्पिक साधनों का उपयोग करना होगा। इससे दिवालिया कंपनियों की बिक्री प्रक्रिया, निवेशकों की रणनीति और परिसमापन कार्यवाहियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
