राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी), मुंबई पीठ ने प्रीमियर लिमिटेड के कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि समिति ऑफ क्रेडिटर्स (सीओसी) द्वारा स्वीकृत और न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित रिजोल्यूशन प्लान को केवल इसलिए पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेजा जा सकता क्योंकि बाद में कंपनी की संपत्तियों का मूल्य बढ़ गया हो या कोई नई संपत्ति सामने आ गई हो। न्यायाधिकरण ने कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (आईबीसी) का उद्देश्य केवल परिसंपत्तियों का अधिकतम मूल्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि समयबद्ध समाधान और निश्चितता सुनिश्चित करना भी है।
यह फैसला प्रीमियर लिमिटेड के दिवाला मामले में दायर चार अंतरिम आवेदनों पर 18 जून 2026 को सुनाया गया। मामले की सुनवाई एनसीएलटी मुंबई की कोर्ट-4 में तकनीकी सदस्य अनिल राज चेल्लन और न्यायिक सदस्य के. आर. साजी कुमार की पीठ ने की।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, प्रीमियर लिमिटेड के खिलाफ 29 जनवरी 2021 को सीआईआरपी शुरू किया गया था। बाद में समिति ऑफ क्रेडिटर्स ने फैब मेटल्स प्राइवेट लिमिटेड एवं उसके सहयोगियों द्वारा प्रस्तुत रिजोल्यूशन प्लान को 92.47 प्रतिशत मतों से मंजूरी दी। फरवरी 2022 में इस प्लान की स्वीकृति के लिए आवेदन एनसीएलटी में दाखिल किया गया, जो अभी भी विचाराधीन है।
इस बीच महाराष्ट्र हाईवेज अधिनियम, 1955 के तहत विरार-अलीबाग मल्टीपर्पज मार्गिका परियोजना के लिए प्रीमियर लिमिटेड की कुछ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। अधिग्रहण नोटिस मिलने के बाद कंपनी की भूमि के बदले मिलने वाले संभावित मुआवजे का मूल्य काफी बढ़ गया। इसके बाद प्रमुख वित्तीय ऋणदाता एडेलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (ईएआरसी) ने दावा किया कि भूमि अधिग्रहण से मिलने वाला अतिरिक्त लाभ कंपनी के लेनदारों और अन्य हितधारकों को मिलना चाहिए, न कि सफल रिजोल्यूशन आवेदक को।
ईएआरसी ने यह भी तर्क दिया कि कुछ भूमि परिसंपत्तियां पहले कंपनी के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थीं और रिजोल्यूशन प्लान तैयार करते समय उनका मूल्यांकन नहीं हुआ था। उसके अनुसार, भूमि अधिग्रहण के कारण कंपनी की परिसंपत्तियों का मूल्य अत्यधिक बढ़ गया है और ऐसी स्थिति में प्लान को पुनः सीओसी के पास भेजकर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए ताकि लेनदारों को बेहतर वसूली मिल सके।
दूसरी ओर सफल रिजोल्यूशन आवेदक फैब मेटल्स प्राइवेट लिमिटेड ने इसका विरोध करते हुए कहा कि एक बार सीओसी द्वारा रिजोल्यूशन प्लान स्वीकृत होकर न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत हो जाने के बाद उसे बदलना या वापस लेना कानूनन संभव नहीं है। कंपनी ने कहा कि वह उपलब्ध सूचना ज्ञापन और परिसंपत्ति विवरण के आधार पर ही प्लान लेकर आई थी और बाद में परिस्थितियों में आए बदलाव के आधार पर सौदे की शर्तें नहीं बदली जा सकतीं।
एनसीएलटी ने अपने विस्तृत निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों, विशेष रूप से Ebix Singapore Pvt. Ltd. और State Bank of India vs Murari Lal Jalan Consortium मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सीओसी द्वारा स्वीकृत और न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत रिजोल्यूशन प्लान सीओसी तथा सफल रिजोल्यूशन आवेदक दोनों के लिए बाध्यकारी और अपरिवर्तनीय हो जाता है। न्यायाधिकरण ने कहा कि “स्वीकृत रिजोल्यूशन प्लान को केवल अधिक मूल्य प्राप्त करने के उद्देश्य से दोबारा खोलना आईबीसी की समयबद्ध प्रक्रिया और निश्चितता के सिद्धांत के विपरीत होगा।”
पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “परिसंपत्तियों के मूल्य का अधिकतमकरण आईबीसी का एक उद्देश्य है, लेकिन यह एकमात्र उद्देश्य नहीं है। इसे निर्धारित समयसीमा और प्रक्रिया की निश्चितता के साथ संतुलित करना आवश्यक है।” न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि यदि हर बार बाद में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना पर स्वीकृत प्लानों की समीक्षा होने लगे, तो दिवाला समाधान प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होगी।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि सीआईआरपी अवधि समाप्त होने और रिजोल्यूशन प्लान सीओसी द्वारा स्वीकृत हो जाने के बाद रिजोल्यूशन प्रोफेशनल तथा सीओसी की शक्तियां सीमित हो जाती हैं। वे ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कर सकते जो पहले से स्वीकृत रिजोल्यूशन प्लान को प्रभावित करे, जब तक कि सफल रिजोल्यूशन आवेदक उसकी सहमति न दे।
न्यायाधिकरण ने रिजोल्यूशन प्रोफेशनल की ओर से दायर आवेदन को खारिज कर दिया तथा सफल रिजोल्यूशन आवेदक की याचिका को स्वीकार करते हुए भूमि अधिग्रहण और मुआवजे से संबंधित सीओसी के प्रस्तावों पर रोक लगा दी। साथ ही ईएआरसी की उस मांग को भी अस्वीकार कर दिया गया जिसमें रिजोल्यूशन प्लान को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की मांग की गई थी। हालांकि न्यायाधिकरण ने यह प्रश्न खुला रखा कि भूमि अधिग्रहण मुआवजे का अंतिम लाभ किसे मिलेगा, इस पर अंतिम निर्णय रिजोल्यूशन प्लान स्वीकृति आवेदन के निपटारे के समय किया जा सकता है।
यह फैसला आईबीसी के तहत चल रहे अनेक दिवाला मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि बाद में संपत्ति मूल्य बढ़ने या नई परिसंपत्तियों की जानकारी मिलने मात्र से पहले से स्वीकृत रिजोल्यूशन प्लान को पुनः वार्ता के लिए नहीं खोला जा सकता।
