एयर इंडिया को राहत नहीं: बिजनेस क्लास की खराब सीट को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने माना सेवा में कमी, 20 लाख रुपये मुआवजा बरकरार

The Rajpatra

नई दिल्ली: राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) ने एयर इंडिया और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी न्यायमूर्ति राजेश चंद्र के बीच चले लंबे उपभोक्ता विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के आदेश को बरकरार रखा है। आयोग ने माना कि बिजनेस क्लास का अतिरिक्त किराया लेने के बावजूद यात्री को खराब और न झुकने वाली सीट उपलब्ध कराना उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) है। इसके साथ ही एयर इंडिया के खिलाफ 20 लाख रुपये के मुआवजे और बिजनेस क्लास किराए की वापसी का आदेश भी कायम रखा गया।

12 जून 2026 को पारित आदेश में NCDRC की पीठ ने एयर इंडिया तथा शिकायतकर्ता दोनों की अपीलों को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि राज्य आयोग द्वारा दिया गया मुआवजा न तो अत्यधिक है और न ही इतना कम कि उसमें हस्तक्षेप किया जाए।

मामले की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी जब सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी न्यायमूर्ति राजेश चंद्र और उनकी पत्नी ने दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को तथा वापसी की हवाई यात्रा के लिए एयर इंडिया के टिकट बुक किए थे। शिकायतकर्ता के अनुसार उन्हें लंबे समय से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस और साइटिका जैसी स्वास्थ्य समस्याएं थीं। इसी कारण उन्होंने इकोनॉमी क्लास से बिजनेस क्लास में अपग्रेडेशन कराया और इसके लिए प्रति सीट 1.23 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान किया।

शिकायत के अनुसार 22 सितंबर 2022 को सैन फ्रांसिस्को से दिल्ली लौटते समय उन्हें बिजनेस क्लास की सीट संख्या 08D आवंटित की गई, जो तकनीकी रूप से खराब थी और पूरी तरह रिक्लाइन नहीं हो रही थी। उन्होंने उड़ान के दौरान कई बार केबिन क्रू से शिकायत की, लेकिन न तो सीट ठीक की गई और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि अन्य सीटें खाली होने के बावजूद उन्हें दूसरी सीट नहीं दी गई। लगभग 15 घंटे की लंबी उड़ान के दौरान उन्हें भारी शारीरिक असुविधा का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी स्वास्थ्य समस्याएं और बढ़ गईं।

भारत लौटने के बाद उन्होंने चिकित्सा उपचार, फिजियोथेरेपी और बेड रेस्ट लेने की बात कही। इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार के लोक शिकायत तंत्र और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के समक्ष शिकायत दर्ज कराई, लेकिन संतोषजनक कार्रवाई न होने पर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने मामले की सुनवाई के बाद जनवरी 2024 में एयर इंडिया को सेवा में कमी का दोषी माना था। आयोग ने कहा था कि शिकायतकर्ता ने आरामदायक यात्रा के लिए अतिरिक्त राशि देकर बिजनेस क्लास का टिकट खरीदा था, लेकिन एयरलाइन उस स्तर की सुविधा उपलब्ध कराने में विफल रही। राज्य आयोग ने एयर इंडिया को बिजनेस क्लास टिकट की लागत 1,69,002 रुपये ब्याज सहित लौटाने, 20 लाख रुपये मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा के लिए मुआवजे के रूप में देने तथा 20,000 रुपये वाद व्यय का भुगतान करने का निर्देश दिया था।

इस आदेश के खिलाफ दोनों पक्ष NCDRC पहुंचे। शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि उन्हें हुए नुकसान और स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव को देखते हुए मुआवजा बढ़ाया जाना चाहिए। दूसरी ओर एयर इंडिया ने कहा कि सीट में किसी प्रकार की खराबी नहीं थी और विमान के तकनीकी निरीक्षण में भी ऐसी कोई समस्या सामने नहीं आई थी। एयरलाइन ने यह भी दावा किया कि उड़ान के दौरान किसी खराब सीट या क्रू के असहयोग संबंधी शिकायत का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

एयर इंडिया ने यह भी तर्क दिया कि मामला “अनुचित अनुबंध” (Unfair Contract) की श्रेणी में नहीं आता और राज्य आयोग के पास इस विवाद की सुनवाई करने का वित्तीय अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) भी नहीं था। हालांकि NCDRC ने इन सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि यदि एयर इंडिया को अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति थी तो उसे प्रारंभिक चरण में ही उठाया जाना चाहिए था। पूरे मुकदमे में भाग लेने और बाद में प्रतिकूल आदेश आने के बाद ऐसी आपत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती।

आयोग ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत भी स्पष्ट किया। NCDRC ने कहा कि केवल इसलिए किसी उपभोक्ता शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि शिकायतकर्ता ने गलत कानूनी प्रावधान या गलत कानूनी शब्दावली का उपयोग कर लिया हो। आयोग ने कहा, “किसी शिकायत में किसी विशेष वैधानिक प्रावधान का गलत उल्लेख या गलत नामकरण, वास्तविक उपभोक्ता शिकायत को समाप्त नहीं कर सकता, यदि प्रस्तुत तथ्य सेवा में कमी का स्पष्ट मामला दर्शाते हों।”

NCDRC ने माना कि शिकायत का मूल आधार यह था कि एयरलाइन ने बिजनेस क्लास के लिए अतिरिक्त शुल्क लिया लेकिन उससे जुड़ी मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं कराई। लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ान में कार्यशील रिक्लाइनिंग सीट बिजनेस क्लास सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसका अभाव उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी माना जाएगा।

मुआवजे के मुद्दे पर आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उपभोक्ता मामलों में मुआवजा न्यायसंगत, उचित और वास्तविक क्षति के अनुरूप होना चाहिए। यह न तो अनुचित लाभ का माध्यम बनना चाहिए और न ही पीड़ित उपभोक्ता के साथ अन्याय होना चाहिए। आयोग ने माना कि राज्य आयोग द्वारा निर्धारित मुआवजा इन सिद्धांतों के अनुरूप है।

यह फैसला विमान यात्रियों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि कोई एयरलाइन प्रीमियम श्रेणी की सेवा के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूलती है, तो उसे उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाएं भी सुनिश्चित करनी होंगी। अन्यथा उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह आदेश भविष्य में एयरलाइनों और अन्य सेवा प्रदाताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जाएगा, जहां उपभोक्ता द्वारा भुगतान की गई प्रीमियम राशि के अनुरूप सेवा उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व माना जाएगा।