छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई में वर्ष 2000 में हुए गोलीकांड से जुड़े बहुचर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीनों आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि घटना के लगभग 25 वर्ष बीत जाने और आरोपियों के आपराधिक रिकॉर्ड न होने को देखते हुए अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दी गई सजा में आंशिक कमी की है। वहीं मुख्य आरोपी राजेंद्र की आर्म्स एक्ट के तहत तीन वर्ष की सजा यथावत रखी गई है।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने राजेंद्र, लीलांबर सिंह और तामेश्वर सिन्हा द्वारा दायर आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित कर दिया है कि पीड़ित हरेंद्र गुप्ता को संपत्ति विवाद के चलते गोली मारी गई थी। अदालत ने माना कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही, चिकित्सकीय साक्ष्य और मृत्यु पूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) अभियोजन के मामले को पर्याप्त रूप से पुष्ट करते हैं।

मामले के अनुसार 26 नवंबर 2000 की रात भिलाई के सुभाष चौक क्षेत्र में हरेंद्र गुप्ता पर गोली चलाई गई थी। घायल अवस्था में अस्पताल ले जाए जाने के बाद उन्होंने आरोप लगाया था कि संपत्ति विवाद को लेकर राजेंद्र, लीलांबर और तामेश्वर ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी और उसी विवाद के कारण हमला किया गया। जांच के दौरान पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर मामले की विवेचना शुरू की।
सुनवाई के दौरान चिकित्सकों ने बताया कि पीड़ित के शरीर में बड़ी संख्या में छर्रे पाए गए थे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उस पर देशी कट्टे या अन्य आग्नेयास्त्र से हमला किया गया था। अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य सीधे तौर पर यह साबित करते हैं कि पीड़ित को गोली लगी थी और यह तथ्य अभियोजन के मामले को मजबूत बनाता है।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि घटना में प्रयुक्त हथियार बरामद नहीं किया गया और एक आरोपी घटना के समय किसी पारिवारिक कार्यक्रम में मौजूद था। साथ ही यह भी कहा गया कि आर्म्स एक्ट के तहत अभियोजन चलाने से पहले जिला दंडाधिकारी की अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए दोषसिद्धि रद्द की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल हथियार की बरामदगी न होना अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता। यदि प्रत्यक्षदर्शी गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य विश्वसनीय हों तो दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अपराध में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत अभियोजन चलाने के लिए जिला दंडाधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है। इसलिए इस आधार पर सजा को रद्द करने का कोई कारण नहीं बनता।
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि घायल व्यक्ति की गवाही का विशेष महत्व होता है क्योंकि वह स्वयं घटना का शिकार होता है और वास्तविक अपराधियों को छोड़कर किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाने की संभावना सामान्यतः कम होती है। अदालत ने पाया कि पीड़ित की गवाही पूरे मामले में सुसंगत और विश्वसनीय रही।
हालांकि सजा के प्रश्न पर अदालत ने माना कि घटना को 25 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान आरोपियों ने जमानत का दुरुपयोग नहीं किया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने IPC की धारा 324 के तहत तीनों आरोपियों को दी गई एक वर्ष की सजा घटाकर चार माह के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दी। लेकिन राजेंद्र को आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दी गई तीन वर्ष की सजा में कोई राहत नहीं दी गई क्योंकि कानून में इसके लिए न्यूनतम सजा निर्धारित है।
हाईकोर्ट ने आरोपियों को दो माह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है ताकि वे शेष सजा भुगत सकें। अदालत ने यह भी कहा कि उन्हें पहले से जेल में बिताई गई अवधि का समायोजन कानून के अनुसार दिया जाएगा।
यह फैसला आपराधिक न्याय व्यवस्था में घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के महत्व, मेडिकल साक्ष्यों की विश्वसनीयता और आर्म्स एक्ट से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को पुनः स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
