एनजीटी का बड़ा निर्देश: पर्यावरणीय मंजूरी में देरी रोकने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू कराने का आदेश

NGT - National Green Tribunal

नई दिल्ली – पर्यावरणीय मंजूरी और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी अनुमति प्रक्रियाओं में होने वाली देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को देशभर के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के प्रभावी क्रियान्वयन का निर्देश दिया है। अधिकरण ने कहा कि पर्यावरणीय कानूनों के पालन को सुनिश्चित करने, शिकायतों के त्वरित निस्तारण और अनुमति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाने के लिए राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को नई व्यवस्था अपनानी होगी।

यह आदेश नवीन कुमार बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में पारित किया गया। मूल याचिका में आरोप लगाया गया था कि हिमाचल प्रदेश के ऊना स्थित एक निजी अस्पताल बिना आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृतियों और बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन संबंधी अनुमतियों के संचालन कर रहा था। मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने पाया कि यह केवल एक संस्थान तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि देशभर में पर्यावरणीय मंजूरी और प्राधिकरण देने की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती बन चुका है।

अधिकरण ने अपने पूर्व आदेश में कहा था कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों द्वारा ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ (CTE), ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (CTO) तथा विभिन्न पर्यावरणीय प्राधिकरणों के आवेदनों के निस्तारण में अक्सर अत्यधिक देरी होती है। न्यायाधिकरण ने टिप्पणी की थी कि ऐसी देरी न केवल प्रशासनिक जटिलताएं पैदा करती है बल्कि भ्रष्टाचार की संभावनाओं को भी बढ़ावा देती है। इसी कारण CPCB को एक विस्तृत SOP तैयार करने का निर्देश दिया गया था, जिससे सभी राज्यों में एक समान और समयबद्ध व्यवस्था लागू हो सके।

CPCB ने अधिकरण के निर्देशों के अनुपालन में एक विशेषज्ञ समिति गठित कर SOP तैयार की। मसौदे पर राज्यों और अन्य हितधारकों से सुझाव प्राप्त करने के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया और सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों तथा प्रदूषण नियंत्रण समितियों को लागू करने के लिए भेज दिया गया।

नई SOP के अनुसार पर्यावरणीय स्वीकृतियों के लिए निर्धारित समयसीमा का कड़ाई से पालन किया जाएगा। विभिन्न उद्योगों की श्रेणियों के अनुसार आवेदन का निस्तारण 30 से 90 दिनों के भीतर करना होगा। यदि कोई आवेदन निर्धारित अवधि में तय नहीं होता है तो उसे राज्य स्तरीय निगरानी समिति के समक्ष रखा जाएगा, जो देरी के कारणों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है। इतना ही नहीं, अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी अनुशंसा की जा सकेगी।

SOP का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरणीय अनुमतियों की प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाना है। CPCB ने ‘यूनिफाइड कंसेंट मैनेजमेंट एंड ऑथराइजेशन सिस्टम’ (UCAMS) विकसित किया है, जो जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत जारी विभिन्न अनुमतियों और प्राधिकरणों के लिए एकीकृत ऑनलाइन मंच के रूप में कार्य करेगा। सभी राज्यों को इस प्रणाली से जुड़ने के निर्देश दिए गए हैं।

अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय अनुपालन केवल शिकायत मिलने के बाद की जाने वाली कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। SOP के तहत प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सक्रिय निगरानी व्यवस्था अपनानी होगी। उद्योगों की नियमित जांच, ऑनलाइन उत्सर्जन निगरानी प्रणालियों से मिलने वाले अलर्ट, नागरिकों की शिकायतें, रासायनिक रिसाव, आगजनी, पर्यावरणीय दुर्घटनाएं और जनस्वास्थ्य से जुड़े खतरों पर तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

सार्वजनिक शिकायतों के निस्तारण को मजबूत करने के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। SOP में CPGRAMS और CPCB के SAMEER ऐप का उल्लेख करते हुए राज्यों को अपने-अपने शिकायत निवारण पोर्टल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इन पोर्टलों के माध्यम से नागरिक पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन की शिकायत दर्ज कर सकेंगे, उसकी प्रगति को ट्रैक कर सकेंगे और संबंधित कार्रवाई की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

CPCB की अनुपालन रिपोर्ट और SOP का अवलोकन करने के बाद एनजीटी ने मामला निस्तारित करते हुए CPCB को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SOP के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी करे तथा आवश्यक होने पर अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों को निर्देश जारी करे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश पर्यावरणीय प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे उद्योगों को समयबद्ध मंजूरी मिलने में मदद मिलेगी, वहीं आम नागरिकों को पर्यावरणीय शिकायतों के समाधान के लिए अधिक प्रभावी और डिजिटल मंच उपलब्ध हो सकेगा। साथ ही, पर्यावरणीय कानूनों के पालन को लेकर राज्यों की जवाबदेही भी बढ़ेगी।