जगदलपुर – शादी का भरोसा देकर युवती के साथ दुष्कर्म करने और पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने के मामले में जगदलपुर की अपर सेशन न्यायाधीश एफटीसी शैलेश अच्युत्य पटवर्धन की अदालत ने पुलिस विभाग के तत्कालीन सब इंस्पेक्टर विकेश चौहान को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। अदालत ने दुष्कर्म के अपराध में 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड तथा पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने के अपराध में 5 वर्ष के सश्रम कारावास और 5 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी।
अर्थदंड की राशि जमा नहीं करने पर दुष्कर्म के मामले में तीन माह और दूसरी शादी के अपराध में एक माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। अदालत ने मामले की परिस्थितियों और अभियुक्त के पुलिस विभाग में लोक सेवक के पद पर होने को देखते हुए अपराध को गंभीर माना।
अभियोजन के अनुसार आरोपी और पीड़िता की पहचान फेसबुक के माध्यम से हुई थी। पीड़िता आरोपी की दूर की रिश्तेदार भी थी। घटना के समय आरोपी चित्रकूट चौकी में सब इंस्पेक्टर के पद पर पदस्थ था। बातचीत के दौरान आरोपी ने स्वयं को तलाकशुदा बताते हुए पीड़िता से विवाह करने का भरोसा दिलाया। नवंबर 2018 में वह पीड़िता के माता-पिता से मिला और विवाह का आश्वासन देने के बाद उसे जगदलपुर ले आया।
इसके बाद पीड़िता आरोपी के पुलिस क्वार्टर में रहने लगी। अभियोजन के मुताबिक 6 जनवरी 2019 को आरोपी ने विवाह का भरोसा देकर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में वह पीड़िता को चित्रकूट स्थित शिव मंदिर ले गया और वहां विवाह किया। इसके बाद दोनों साथ रहने लगे।
कुछ समय बाद पीड़िता को पता चला कि आरोपी की पहली पत्नी जीवित है और उसके साथ उसका तलाक नहीं हुआ है। इस जानकारी के बाद पीड़िता ने आरोपी से इस संबंध में पूछताछ की, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद उसने अपने परिजनों को पूरी घटना की जानकारी दी और रायपुर के न्यू राजेंद्र नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने न्यायालय के समक्ष संबंधित साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए। अभियोजन ने यह पक्ष रखा कि आरोपी ने स्वयं को तलाकशुदा बताकर पीड़िता को विवाह का विश्वास दिलाया, जबकि उसकी पहली शादी कायम थी। इसके बावजूद उसने पीड़िता के साथ संबंध बनाए और बाद में मंदिर में विवाह की रस्म पूरी की।
फैसले में अदालत ने अभियुक्त के आचरण को अनैतिक, असामाजिक और विधि-विरुद्ध बताते हुए अपराध की गंभीरता पर टिप्पणी की। न्यायालय ने माना कि आरोपी पुलिस जैसे लोक सेवक के पद पर रहते हुए पहले से विवाहित था। इसके बावजूद उसने अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाकर पीड़िता को विवाह का विश्वास दिलाया और विवाह के वचन का पालन करने के बजाय उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
अदालत ने यह भी माना कि पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए पीड़िता के साथ किया गया विवाह वास्तविक वैवाहिक संबंध स्थापित करने की वैधानिक क्षमता के अभाव में किया गया दिखावटी विवाह था। न्यायालय ने अभियुक्त के कृत्य को महिला की गरिमा और शील के विरुद्ध गंभीर अपराध माना।
अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(ढ) के तहत 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड तथा धारा 494 के तहत 5 वर्ष के सश्रम कारावास और 5 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया। दोनों सजाएं साथ-साथ चलने के कारण प्रभावी कारावास की अवधि 10 वर्ष होगी। मामले की कार्रवाई के दौरान आरोपी अग्रिम जमानत पर था। अभियोजन की ओर से लोक अभियोजक प्रीति वानखेड़े ने पैरवी की।
यह फैसला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने आरोपी की पुलिस सेवा में पदस्थापना और लोक सेवक के रूप में उसके दायित्वों को भी मामले की गंभीरता के संदर्भ में देखा। विवाह के संबंध में गलत तथ्य बताकर किसी महिला को विश्वास में लेना और उस विश्वास का दुरुपयोग कर शारीरिक संबंध स्थापित करना, विशेषकर तब जब आरोपी पहले से विवाहित हो, न्यायालय ने गंभीर आपराधिक आचरण के रूप में माना है।
