प्रयागराज: राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की इलाहाबाद पीठ ने हिंद एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड की दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मॉडर्न ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड की 241.29 करोड़ रुपये की संशोधित परिचालन ऋण (ऑपरेशनल डेट) संबंधी दावा याचिका खारिज कर दी। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान बहुत विलंब से दाखिल किए गए संशोधित दावे, विशेषकर एमएसएमई अधिनियम के तहत विवादित ब्याज पर आधारित दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
11 जून 2026 को पारित आदेश में न्यायिक सदस्य प्रवीण गुप्ता और तकनीकी सदस्य आशीष वर्मा की पीठ ने कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (आईबीसी) का उद्देश्य समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करना है। यदि दावों के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद बड़े पैमाने पर संशोधित दावों को स्वीकार किया जाने लगे, तो इससे पूरी दिवाला प्रक्रिया प्रभावित होगी और आईबीसी का मूल उद्देश्य विफल हो जाएगा।
मामले में मॉडर्न ओवरसीज ने शुरुआत में लगभग 29.21 करोड़ रुपये का दावा प्रस्तुत किया था, जिसे समाधान पेशेवर (Resolution Professional) ने स्वीकार भी कर लिया था। बाद में कंपनी ने एमएसएमई विकास अधिनियम, 2006 के तहत देय ब्याज जोड़ते हुए अपना दावा बढ़ाकर 241.29 करोड़ रुपये कर दिया। कंपनी का आरोप था कि संशोधित दावा लंबित रखा गया और बाद में उसे दावा संशोधित कराने के लिए एनसीएलटी जाने की सलाह दी गई। कंपनी ने समाधान योजना की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए समाधान पेशेवर और सफल समाधान आवेदक पर कई अनियमितताओं के आरोप लगाए।
समाधान पेशेवर ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि संशोधित दावा निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के लगभग 561 दिन बाद प्रस्तुत किया गया था। इसके अलावा अतिरिक्त राशि एमएसएमई अधिनियम के तहत ब्याज पर आधारित थी, जिसका किसी सक्षम प्राधिकरण द्वारा पहले कभी निर्धारण या न्यायिक निर्णय नहीं हुआ था। इसलिए इसे स्वीकार करना आईबीसी और सीआईआरपी विनियमों के अनुरूप नहीं था।
सुनवाई के दौरान एनसीएलटी ने माना कि समाधान पेशेवर का कार्य केवल दावों को प्राप्त करना, उनका सत्यापन करना और उनका संकलन करना है। उसे विवादित देनदारियों का निर्धारण करने या किसी दावे की न्यायिक जांच करने का अधिकार नहीं है। न्यायाधिकरण ने कहा, “समाधान पेशेवर के पास विवादित देनदारियों का निर्धारण या ऐसे दावों की मात्रा तय करने की न्यायिक शक्ति नहीं है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एमएसएमई अधिनियम के तहत ब्याज की पात्रता, उसकी गणना और देयता का निर्णय संबंधित सक्षम मंच ही कर सकता है। एनसीएलटी ने कहा, “एमएसएमई अधिनियम के तहत ब्याज की गणना या पात्रता का निर्णय इस न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”
न्यायाधिकरण ने कंपनी द्वारा समिति ऑफ क्रेडिटर्स (सीओसी) की मंजूर समाधान योजना को चुनौती देने का अधिकार भी अस्वीकार कर दिया। पीठ ने कहा कि समाधान योजना को 87.54 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी के साथ सीओसी ने मंजूरी दी थी और आईबीसी के तहत व्यावसायिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है। ऐसे में परिचालन ऋणदाता को केवल असंतोष के आधार पर समाधान योजना को चुनौती देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
इस फैसले का व्यापक प्रभाव दिवाला मामलों में लंबित दावों और एमएसएमई अधिनियम के तहत ब्याज संबंधी विवादों पर पड़ेगा। निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि बिना किसी सक्षम प्राधिकरण के पूर्व निर्णय के केवल ब्याज जोड़कर दिवाला प्रक्रिया के अंतिम चरण में दावा कई गुना बढ़ाना स्वीकार्य नहीं होगा। साथ ही, यह आदेश समाधान पेशेवरों की सीमित भूमिका और समिति ऑफ क्रेडिटर्स के व्यावसायिक निर्णयों की सर्वोच्चता को भी दोहराता है।
