दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के तहत व्यक्तिगत गारंटरों के खिलाफ चलने वाली दिवाला कार्यवाही में रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) की भूमिका और स्वतंत्रता को मजबूत करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT), जयपुर पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी पक्ष की असंतुष्टि या रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की सिफारिशों से असहमति के आधार पर उसे बदला नहीं जा सकता। RP को हटाने या बदलने के लिए पक्षपात, हितों के टकराव, कदाचार, अक्षमता या वैधानिक दायित्वों के निष्पक्ष निर्वहन में विफलता जैसे ठोस और प्रमाणित आधार होना आवश्यक है।
यह आदेश 19 जून 2026 को एनसीएलटी जयपुर की तकनीकी सदस्य कविता भटनागर ने पारित किया। मामला यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शुरू की गई व्यक्तिगत गारंटर दिवाला कार्यवाही से जुड़ा था। इस मामले में सांगा बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड के व्यक्तिगत गारंटर इस्लामुद्दीन कागजी ने आईबीसी की धारा 98 तथा एनसीएलटी नियम, 2016 के नियम 11 के तहत आवेदन दायर कर नियुक्त रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ऋषभ चंद लोढ़ा को बदलने की मांग की थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, वित्तीय ऋणदाता यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने 1 जनवरी 2024 को आईबीसी की धारा 95 के तहत आवेदन दायर किया था। इसके बाद 4 जनवरी 2024 को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति की गई। RP ने बाद में धारा 99 के तहत अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए आवेदन को स्वीकार किए जाने की सिफारिश की थी। इसी सिफारिश से असहमति जताते हुए व्यक्तिगत गारंटर ने RP को बदलने की मांग उठाई।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न तय किया कि क्या धारा 95 के तहत नियुक्त रेजोल्यूशन प्रोफेशनल को धारा 100 के अंतर्गत दिवाला आवेदन स्वीकार होने के बाद बदला जा सकता है और क्या वर्तमान मामले में ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। न्यायाधिकरण ने आईबीसी की धाराओं 97, 98, 99 और 100 का संयुक्त अध्ययन करते हुए कहा कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की भूमिका केवल धारा 99 के तहत रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह दिवाला प्रक्रिया के दौरान आगे भी वैधानिक दायित्वों का निर्वहन करता रहता है।
पीठ ने कहा कि न्यायाधिकरण के पास उपयुक्त परिस्थितियों में RP को बदलने की शक्ति अवश्य है, लेकिन यह अधिकार नियमित रूप से या केवल किसी पक्ष की सुविधा के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया कि दिवाला आवेदन स्वीकार होने तक RP कई महत्वपूर्ण वैधानिक कार्य कर चुका होता है, इसलिए उसके प्रतिस्थापन का अनुरोध अत्यधिक सावधानी के साथ परखा जाना चाहिए।
न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “रेजोल्यूशन प्रोफेशनल को केवल तभी बदला जा सकता है जब पक्षपात, हितों के टकराव, कदाचार, अक्षमता, प्रक्रियागत अनियमितता या निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से वैधानिक दायित्वों के निर्वहन में विफलता जैसे ठोस तथ्य सामने आएं।” पीठ ने आगे कहा कि, “कार्यवाही के परिणाम या रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की सिफारिशों से असंतुष्टि मात्र प्रतिस्थापन का आधार नहीं बन सकती।”
न्यायाधिकरण ने पाया कि आवेदक ने RP के खिलाफ ऐसा कोई विशिष्ट आरोप या तथ्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे दिवाला प्रक्रिया की निष्पक्षता या विश्वसनीयता प्रभावित होती हो। आवेदन मुख्य रूप से RP की राय और सिफारिशों से असहमति पर आधारित था। पीठ ने कहा कि आईबीसी की वैधानिक व्यवस्था किसी पक्ष की व्यक्तिगत नाराजगी या असंतोष के आधार पर RP को बदलने की अनुमति नहीं देती।
इन परिस्थितियों में एनसीएलटी ने आईए (आईबीसी) संख्या 567/जेपीआर/2025 को खारिज कर दिया। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के प्रतिस्थापन की मांग तक सीमित है और इससे मूल दिवाला कार्यवाही के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यह निर्णय व्यक्तिगत गारंटरों से संबंधित दिवाला मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल एक स्वतंत्र वैधानिक अधिकारी होता है और उसकी नियुक्ति को केवल इसलिए चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि किसी पक्ष को उसकी रिपोर्ट या सिफारिशें पसंद नहीं हैं। यह आदेश दिवाला प्रक्रिया की निष्पक्षता, स्थिरता और समयबद्धता को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
