एनसीएलटी का बड़ा फैसला: हर तथ्य छिपाना ‘झूठी गवाही’ नहीं, परजरी की कार्यवाही से किया इनकार

National Company Law Tribunal - NCLT

नई दिल्ली: राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी), नई दिल्ली की कोर्ट-IV ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी याचिका या न्यायिक कार्यवाही में हर त्रुटि, अधूरी जानकारी या तथ्य छिपाने को स्वतः झूठी गवाही (परजरी) नहीं माना जा सकता। न्यायाधिकरण ने कहा कि परजरी की कार्यवाही केवल उन्हीं मामलों में शुरू की जानी चाहिए, जहां जानबूझकर महत्वपूर्ण झूठ बोला गया हो, उससे न्यायालय को गुमराह कर लाभ प्राप्त किया गया हो और न्याय के हित में अभियोजन आवश्यक हो। इसी आधार पर एनसीएलटी ने टोलमैन इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कैप्सटेक नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दायर परजरी आवेदन को खारिज कर दिया।

न्यायिक सदस्य मन्नी संकारैयाह शनमुग सुंदरम और तकनीकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी की पीठ ने यह आदेश 1 जून 2026 को पारित किया। आवेदन राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण नियम, 2016 के नियम 11 के साथ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 227 एवं 229 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 215 एवं 379 के तहत दायर किया गया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि ऑपरेशनल क्रेडिटर ने दिवाला कार्यवाही के दौरान न्यायाधिकरण के समक्ष झूठे और भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए हैं।

मामला कंप्यूटर, लैपटॉप और उनके पुर्जों की आपूर्ति से जुड़े व्यावसायिक लेनदेन का था। कैप्सटेक नेटवर्क ने टोलमैन इंटरनेशनल को आपूर्ति की थी और भुगतान बकाया होने का दावा करते हुए लगभग 1.04 करोड़ रुपये की मांग नोटिस जारी किया। इसके बाद कंपनी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (आईबीसी) की धारा 9 के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू कराने के लिए एनसीएलटी में याचिका दाखिल की।

टोलमैन इंटरनेशनल का आरोप था कि मांग नोटिस के बाद उसने दो बार 10-10 लाख रुपये, कुल 20 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया था। इन भुगतानों को ऑपरेशनल क्रेडिटर ने स्वीकार भी किया, लेकिन दिवाला याचिका, अतिरिक्त दस्तावेजों और सुनवाई के दौरान उनका उल्लेख नहीं किया। कंपनी का कहना था कि यह जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने और न्यायाधिकरण को गुमराह करने का प्रयास था, इसलिए संबंधित पक्ष के खिलाफ परजरी की आपराधिक कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए।

आवेदन में यह भी तर्क दिया गया कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 424 के अनुसार एनसीएलटी की कार्यवाही न्यायिक कार्यवाही मानी जाती है। इसलिए यदि कोई पक्ष जानबूझकर झूठा बयान देता है या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाता है, तो उसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की झूठी साक्ष्य संबंधी धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

दूसरी ओर, कैप्सटेक नेटवर्क ने कहा कि मूल दिवाला याचिका का अंतिम निर्णय 7 जनवरी 2025 को हो चुका है। न्यायाधिकरण ने उस समय 20 लाख रुपये के भुगतान को ध्यान में रखते हुए पाया था कि बकाया राशि आईबीसी की धारा 4 के तहत आवश्यक एक करोड़ रुपये की न्यूनतम सीमा से नीचे आ गई है। इसी कारण धारा 9 की याचिका खारिज कर दी गई थी। कंपनी का कहना था कि जब मुख्य मामला समाप्त हो चुका है, तब उसके बाद दायर ऐसा आवेदन विचारणीय नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद एनसीएलटी ने कहा कि पूरा विवाद केवल बकाया राशि की गणना और समायोजन से जुड़ा था। न्यायाधिकरण ने पाया कि कथित रूप से छिपाए गए 20 लाख रुपये के भुगतान को अंततः मुख्य दिवाला याचिका की सुनवाई के दौरान ध्यान में रखा गया और उसी आधार पर अंतिम निर्णय दिया गया। इसलिए इस कथित चूक से ऑपरेशनल क्रेडिटर को कोई अनुचित लाभ नहीं मिला।

पीठ ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “परजरी की शक्ति का उपयोग हर याचिका में हुई त्रुटि या किसी तथ्य के उल्लेख न होने पर नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब जब न्यायाधिकरण ने मुख्य मामले में सही वित्तीय स्थिति पर विचार कर अंतिम निर्णय दे दिया हो।” न्यायाधिकरण ने कहा कि कथित तथ्य छिपाने का प्रभाव अंतिम निर्णय पर नहीं पड़ा, क्योंकि वास्तविक वित्तीय स्थिति का परीक्षण पहले ही किया जा चुका था।

एनसीएलटी ने यह भी कहा कि मुख्य दिवाला याचिका के निपटारे के बाद न्यायाधिकरण सामान्यतः ऐसे नए विवादों पर विचार नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि समाप्त हो चुकी कार्यवाही में दायर विविध आवेदन तभी स्वीकार किए जा सकते हैं, जब वे सीमित परिस्थितियों में आवश्यक हों।

न्यायाधिकरण ने आगे स्पष्ट किया, “परजरी की कार्यवाही का उपयोग पहले से तय हो चुके विवादों में प्रतिशोधात्मक या सहायक मुकदमेबाजी के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।” पीठ के अनुसार यह मामला उन असाधारण परिस्थितियों में नहीं आता, जहां झूठी गवाही के लिए आपराधिक कार्रवाई शुरू करना न्याय के हित में आवश्यक हो।

यह निर्णय दिवाला मामलों से जुड़े पक्षकारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि न्यायालय के समक्ष तथ्य छिपाना गंभीर विषय है, लेकिन हर चूक या लेखन संबंधी कमी स्वतः परजरी नहीं बन जाती। यदि कथित त्रुटि का अंतिम निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न्यायालय सही तथ्यों के आधार पर निर्णय दे देता है, तो केवल उसी आधार पर आपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं की जाएगी। यह फैसला बीएनएस और बीएनएसएस के तहत परजरी संबंधी प्रावधानों के सीमित और सावधानीपूर्ण उपयोग की भी पुष्टि करता है।